- शारीरिक दोषों एवं मानस दोषों का वर्णन (Description of Sharir Dosha and Manas Dosha)
अतश्च दोषा देहस्य स्थिरीकरणात् स्थूणा इत्युच्यन्ते।(अ.स.सू. 20/ 4)
एवमनेन प्रकारेणेदं स्थानत्रयसन्निवेशिना दोषत्रयेण स्थूणासदृशेन शरीरमगारसदृशं धार्यते। एव दोषा आचार्यै: स्थूणाशब्देनोच्यन्ते। स्थूणा अगारधारणस्तम्भा उच्यन्ते।।(अ.स.सू. 20/4 पर इन्दु)
शरीर को यदि भवन माना जाये तो दोष शरीर रूपी भवन के खम्भे माने जायेंगे अर्थात शरीर रूपी भवन को स्थिर रखने वाले खम्भो को ही दोष के रूप में जाना जाता हैं। स्थिर रखने से तात्पर्य हे कि जब तक शरीर में दोषो का अस्तित्व रहता है, तब तक ही शरीर का अस्तित्व रहता है।
अधिष्ठान (Site) भेद से दोष दो प्रकार के होते है – शारीर दोष एवं मानस दोष।
- शरीरं सत्त्वसंज्ञं च व्याधीनामाश्रयो मत:। (च0सू0 1/55)
शारीर दोष- वात, पित्त एवं कफ तथा मानस दोष- रज और तम को माना गया है।
तत्र त्रय: शरीरदोषा वातपित्तश्लेष्माण:, ते शरीरं दूषयन्तिय द्वौ पुन: सत्त्वदोषौ रजस्तमश्च, तौ सत्त्वं दूषयत:। ताभ्यां च सत्त्वशरीराभ्यां दुष्टाभ्यां विकृतिरुपजायते, नोपजायते चाप्रदुष्टाभ्याम्।। (च.शा. 4/34)
‘शरीरसत्त्वयोस्तु’ इत्यादिना शरीरमनसी दु:खरूपविकारेऽपि कारणमुक्तेय तत्रैव च यैर्दोषै: शरीरं, मनश्च याभ्यां दोषाभ्यां युक्तं दु:खकारणं भवति, तानाह- तत्र त्रय इत्यादि । विकृतिरुपजायत इति शारीरमानसरोगरूपा विकृतिरुपजायते ।। (च.शा. 4/34 पर चक्रपाणी)
3.1 दोष की परिभाषा (Definition of Dosha)
- माधव निदान मधुकोष टीका में विजयरक्षित के अनुसार दोष की परिभाषा निम्न है-
- प्रकृत्याराम्भकत्वे सति स्वातंत्रेण दुष्टिकर्तृत्व इति दोषत्वम्..।। (मा. नि. मधुकोष टीका)
- सर्व प्राकृत कर्मषु सकर्तृक नियामकत्वे सति स्वातन्त्रेण दूषणशीलत्वं इति…।।
- शरीर दूषणात् दोषा:।।
अत: शरीर के उन द्रव्यों को दोष कहते हैं, जिनमे प्रकृति को उत्पन्न करने के साथ साथ स्वतन्त्र रूप से अन्य दूष्यों को दूषित करने की क्षमता हो।
दोष का परिभाषिक अर्थ शारीरिक दोष (वात पित्त एवं कफ) और मानस दोष (रज एवं तम) दोनो के लिए व्यवहृत है।
दूष्य – विभिन्न उत्तेजक एवं प्रकोपक कारणों से दोषों के विषम होने से व्याधियॉं उत्पन्न होती है। प्रकोपित दोष जिन रचनात्मक एवं क्रियात्मक द्रव्यों को दूषित करते है, उन्हे दूष्य कहते है। दूष्य मे धातु, उपधातु एवं मलो को गिना जाता है।
तालिका संख्या: 3.1: दोष और दूष्यो में विभेद
| क्र. स. | दोष | दूष्य (धातु एवं उपधातु) |
| 1 | प्रकृति उत्पन्न करते है | प्रकृति उत्पन्न नही करते है |
| 2 | शारीरक दोष -वात, पित्त एवं कफ
मानस दोष- रज एवं तम |
शारीरक दूष्य -धातु एवं उपधातु मानस दूष्य -मन एवं इन्द्रिया |
| 3 | इनमें स्वतन्त्र रूप से दूष्यों को दूषित करने की क्षमता होती है। | इनमें स्वतन्त्र रूप से दूषित करने की क्षमता नही होती है। |
| 4 | क्रिया कारक द्रव्य है, जिनका प्रत्यक्ष उनके कर्मो से होता है। | शरीर के रचनात्मक एवं क्रियात्मक अवयव है, |
| 5 | केवल सजीव शरीर में रहते है। | सजीव शरीर में एवं निर्जीव देह दोनो में रहते है। |
तालिका संख्या: 3.2 – दोष और मल में विभेद
| क्र. स. | दोष | मल |
| 1 | प्रकृति उत्पन्न करते है | प्रकृति उत्पन्न नही करते है |
| 2 | शारीरक दोष -वात, पित्त एवं कफ
मानस दोष- रज एवं तम |
मल के भेद – अन्नज मल एवं धातुज मल |
| 3 | इनमें स्वतन्त्र रूप से दूष्यों को दूषित करने की क्षमता होती है। | शरीर में ही रूक जाने पर मलो में स्वतंत्र रूप से मलीन करने की क्षमता होती है किन्तु मलीन एवं दुषीत करने में अन्तर होता है |
| 4 | क्रिया कारक द्रव्य है, जिनका प्रत्यक्ष उनके कर्मो से होता है। | शरीर मे आहार पाक एवं धातु पाक के दोरान उत्पन्न होने वाले अपशिष्ट अवयव है, |
3.2 दोषों की संख्या (Number of Dosha):
दोष दो प्रकार के होते है शारीरक दोष एवं मानस दोष। मानस दोष के दो भेद – रज एवं तम तथा शारीरक दोष के तीन भेद – वात, पित्त एवं कफ (श्लेष्मा) है।
तालिका संख्या: 3.2 – शारीर दोष एवं मानस दोष मे भेद
| शारीर दोष | मानस दोष | |
| 1 | संख्या 3 होती है | संख्या 2 होती है |
| 2 | वात, पित्त एवं कफ | रज एवं तम |
| 3 | शरीर के घटक धातु, उपधातु एवं मलो को दुषित कर सकते है | मन को दुषित कर सकते है |
3.3 दोषों के भेद (Types of Dosha) :
(१) अधिष्ठान भेद (according site) से दोषों के 2 भेद –
अधिष्ठान (site) के आधार पर
१. शारीरिक २. मानस दोष
(२) प्रकति-विकृति के आधार पर दोषों के 2 भेद -स्थिति के आधार
१. प्राकृत दोष
२. वैकृत दोष
(३) अनुबन्ध्य के आधार दोषों के 2 भेद -अनुबन्ध्य के आधार
अनुबन्ध्यानुबन्धविशेषकृतस्तु बहुविधो दोष:भेद:। (च. वि. 6/118)
(1) अनुबन्ध्य
(2) अनुबन्ध
इस प्रकार दोषों मे निम्न गुण होते है-
- दोष शरीर और मन की स्वाभाविक क्रियाये करवाने की क्षमता रखते है।
- शारीरिक एवं मानसिक कर्मों का नियन्त्रण करते है।
- स्वतंत्र रूप से प्रकृति निर्माण कर सकते है।
- स्वतन्त्र रूप से शरीर और मन को दुषित करने की क्षमता रखते हो।
3.4 शारीरिक दोष (Sharirik Dosha) –
अधिष्ठान भेद से शरीर में रोगों के विविध स्थान है। इन स्थानों को मुख्य दो विभागों में विभाजित कर सकते है -शरीर एवं मन । इनमें से शरीर को दूषित करने वाले दोष शारीरिक दोष कहलाते हैं।
वायु: पित्तं कफश्चोक्त: शारीरो दोष संग्रह:। (च. सू 1/57)
वायु: पित्तं कफश्चेति त्रयो दोषा समासत:। (अ.हृ.सू 1/6)
वातपित्तश्लेष्माण एव देहसंभवहेतव:। (सु0सू0 21/3)
वायु: पित्त कफ दोष: शरीर व्याधि हेतव: (का. खिल. 3/20)
शारीरिक दोष तीन है – वात, पित्त और कफ
त्रिदोष सिद्धान्त आयुर्वेद का आधारभूत सिद्धान्त है। यहॉ त्रिदोष का अर्थ ‘शरीर मे उपस्थित तीन दोषो से है ये दोष निम्न है:-
- वात (Vata)
- पित्त (Pitta)
- कफ /श्लेष्मा (Kapha/Sleshma)
अर्थात जब भी हम त्रिदोष शब्द प्रयोग करते है तो हम वात, पित्त एवं कफ के सन्दर्भ मे बात कर रहे होते है। त्रिदोषों को सभी शारीरिक क्रियाओं के नियंत्रणकर्ता कह सकतें है।
अथर्ववेद में इन्हे त्रिधातु तथा आर्चाय सुश्रुत ने त्रिस्थूण भी कहा है। (यहॉ धातु का अर्थ है -धारण करने वाला और स्थूण का अर्थ है -स्तम्भ/खंभा) जिस प्रकार एक घर को खम्भे धारण करते है ठीक उसी प्रकार शरीर इन त्रिदोषे रूपी पिल्लरो पर टिका रहता है। इनके टूटने पर शरीर रूपी घर भी टूट जाता है।
शरीर में होने वाली सभी क्रियाऐं (metabolism reactions) वात, पित्त व कफ के द्वारा सम्पन्न होती है। जैसे-चन्द्रमा अपने विसर्ग कर्म, सूर्य अपने आदान कर्म तथा वायु अपने विक्षेप कर्म द्वारा जगत को धारण करते है; ठीक उसी प्रकार कफ अपने विसर्ग कर्म, पित्त अपने आदान कर्म तथा वायु अपने विक्षेप कर्म द्वारा शरीर का धारण करती है और इन तीन प्रकार की क्रियाओं को सम्मिलित रूप से आयुर्वेद मेटाबॉलिजम कहा जा सकता है। अर्थात त्रिदोष आयुर्वेदिय मेटाबॉलिज्म के रेसपांसिबल फेक्टर है।
3.5 क्या रक्त को चौथा दोष माना जाय (Is Rakta known as fourth Dosha?)
वात, पित्त एवं कफ को सयुक्तरूप से त्रिदोष शब्द से जाना जाता है। अत: दोषो की संख्या तीन ही कही गई है, परन्तु सुश्रुत के कुछ वचनो में रक्त को भी चौथा दोष माना गया हो, ऐसा प्रतित होता है; जिसके निम्न कारण हो सकते है-
- वात, पित्त, कफ के अतिरिक्त रक्त भी शरीर की उत्पति स्थिति तथा विनाश का कारण है।
- शरीर के धारण में वात, पित्त, कफ के साथ-साथ रक्त का महत्व बताया गया है।
- सभी व्याधियों का कारण वात, पित्त, कफ तथा रक्त का वैषम्य बताया है।
- वातज, पित्तज तथा कफज रोगो के साथ-साथ रक्तज रोगों की भी गणना की गई है।
- आयुर्वेद के अन्य ग्रन्थों मे रक्तार्श, रक्त पित्त, रक्तगुल्य आदि अनेक रक्त सम्बन्धी व्याधियों का उल्लेख मिलता है। जिसमें रक्त को प्रधानता दी गई है।
किन्तु यह भी स्पष्ट है कि सभी शास्त्रकारों ने रक्त को चौथा दोष स्वीकार नही किया है।
रक्त को चौथा दोष नही मानने में निम्न कारण दिये गये हैं –
- जिस प्रकार चन्द्रमा, सूर्य और वायु अपने विशिष्ट कर्मों से जगत को धारण करते हैं। उसी प्रकार उनके प्रतिनिधि कफ, पित्त एवं वात दोष क्रमश: विसर्ग, आदान एवं विक्षेप कर्म के द्वारा शरीर धारण करते हैं। इसी सन्दर्भ में भी ग्रन्थकार ने रक्त का उल्लेख नहीं किया है।
- वात, पित्त एवं श्लेष्मा के अपने-अपने प्रकोपक कारणों का उल्लेख है। परन्तु इनके समान रक्त के प्रकोप का कोई स्वतन्त्र कारण नहीं माना गया।
- सुश्रुत संहिता के शोणित वर्णनीय अध्याय के दोषानुसार दूषित रक्त के लक्षणों का वर्णन है, यहॉं वातादि दोषों का दुष्टिकर्ता के रूप में स्वीकार किया जाना तो अभीष्ट है, किन्तु रक्त का दोषरूप में नहीं।
- दोष की परिभाषा में रक्त पूर्ण नही करता है, क्योकि इसमें स्वतंत्र रूप से दुष्टि करने की क्षमता नही होती है एवं न ही इसमें स्वयं प्रकृति उत्पन्न करने की क्षमता होती है।
अत: उपरोक्त कारणों से रक्त को चोथा दोष स्वीकार नही किया गया है। रक्त को धातु के रूप में स्वीकार किया गया ह,ै जो दोषों द्वारा दूषित होकर शरीर में विकार उत्पन्न करती है। अत: यह स्पष्ट रूप से कहा सकता है कि शास्त्रों में रक्त को दोष रूप में स्वीकार नही किया गया है।
वातपित्तश्लेष्माण एव, देहसम्भवहेतव:। तैरेवाव्यापन्नैरधोमध्योध्र्वसन्निविष्टै: शरीरमिदं धार्यतेऽगारमिव स्थूणाभिस्तिसृभि: अतश्च त्रिस्थूणमाहुरेके। त एव च व्यापन्ना: प्रलयहेतव:। तदेभिरेव शोणितचतुर्थै: सम्भवस्थितिप्रलयेष्वप्यविरहितं शरीरं भवति।। (सु0सू0 21/3)
व्रणकारणानि वातादीनि प्रथमं सङ्ख्यादिभिर्निर्दिशन्नाह- वातपित्तश्लेष्माण इत्यादि। देहसम्भवहेतवो देहोत्पत्तिहेतव:। ननु, शुक्रशोणिते देहोत्पत्तिहेतू ? तत् कथं वातादयो देहसम्भवहेतव: कथ्यन्ते ? उच्यते, अविकृता वातादय: शुक्रार्तवादिसहकारितया देहजनका अभिप्रेता इत्यर्थ:। शरीरसम्भवे वातादीनां हेतुत्वं प्रतिपाद्य स्थितिकारणत्वं दर्शयन्नाहतैरेवेत्यादि। तैरेव वातपित्तश्लेष्मभि:, अव्यापन्नै: प्रकृतिस्थैरित्यर्थ:। अधोमध्योध्र्वसन्निविष्टैरिति यथाक्रमेण वातपित्तकफै:। दृष्टान्तमाह. अगारमिवेत्यादि। अगारं गृहम्। एकीयमतमाह- अतश्च त्रिस्थूणमाहुरेके। चकारोऽयं त्रिस्थूणमित्यत्र योज्य:, तेनायमर्थ:. त्रिस्थूणमिति च अत एव हेतोरेको आचार्या आहु:। देहविनाशहेतुत्वमपि वातादीनां निर्दिशन्नाह. त एव व्यापन्ना इत्यादि। चकारोऽत्र भिन्नक्रमे, तेनायमर्थ:- त एव वातादय:, व्यापन्नाश्च विकृतिस्था: प्रलयहेतवो विनाशहेतवो ‘भवन्ति’ इत्यध्याहार:। अन्ये तु ‘प्रलयेऽपि’ इत्यपिशब्दं पठन्ति। शल्यशास्त्रे व्रणारम्भाधिष्ठानभूतत्वात् कस्यचिद्दूष्यस्य प्राधान्यं दर्शयन्नाह-तदित्यादि। एभिरेव वातपित्तकफै:। शोणितचतुर्थैरिति ननु, पूर्वं शोणितमनुपात्तं, तत्कथमिह सम्भवादिषु शोणितस्याविरहितत्वमुक्तं? सत्यं, परमिह शोणितोपादानं कुर्वन्नेकीयमतमिदमिति दर्शयति, तेन व्रणपाके दर्शनद्वयं भवतिय तथाहि-‘नर्तेऽनिलादस्ति रुजा’ (सू. अ. 17) इत्यादिना व्रणपाके दोषा एव व्याप्रियन्त इति दर्शितं, ‘कालान्तरेणाभ्युदितं तु पित्तं’ (सू. अ. 17) इत्यादिना पुन: शोणितचतुर्था एव व्रणपाके व्याप्रियन्त इति। अविरहितं संयुक्तमित्यर्थ:। (सु0सू0 21/3 पर डल्हण )
इस प्रकार सुश्रुत व्रण के कारणों की चर्चा करते हुए शरीर के उत्पत्ति के कारणों में वात, पित्त और कफ को मानते है, किन्तु यहॉ प्रश्न उठता है कि शरीर के उत्पत्ति के कारण तो शुक्र-शोणित होते है, फिर वातादि दोष केसे शरीर के उत्पत्ति के कारणों में गिने गये है? इसका जवाब है कि अविकृत वातादि दोष शुक्र-शोणित द्वारा शरीर के उत्पत्ति में कारण होते है। यह वातादि दोष शरीर को खम्भो के समान धारण करते है औेर यही दोष विकत होने पर प्रलय के कारण भी बनते है। सुश्रुत शल्य चिकित्सक होने के कारण शोणित अर्थात रक्त को भी शरीर के उत्पत्ति एवं प्रलय के हेतु मानते है।
3.6 दिन-रात, उम्र, ऋतु और खाने के आधार पर त्रिदोषों का जैविक चक्र (Biological rhythms of Tridosha on the basis of day-night-age-season and food intake)
पृथ्वी पर जीवन चलाने वाले तत्वो/बाहय वातावरणीय कारको में सुर्य, चन्द्र और वायु प्रमुख है। इन तत्वो का प्रभाव हमेशा एक जैसा नही रहता है। इनके प्रभाव में परिवर्तन से पृथ्वी पर दिन-रात, ऋतु आदि परिवर्तन होते है। जैसे जैसे वातावरणीय परिवर्तन होते है वैसे-वैसे शरीर में भी आन्तरिक वातावरण को समान बनाये रखने के लिये अनुकूलन की क्रियाये होती है जिसके कारण दोषो की मात्रा में परिवर्तन आता है। इस परिवर्तन को दोषो का जैविक चक्र (Biological rhythms of Tridosha) कह सकते है।
3.6.1 दिन के आधार पर त्रिदोषों का जैविक चक्र (Biological rhythms of Tridosha on the basis of day)
दिन के 12 घंटो के समय को 3 भागों में विभाजित किया जाए तो प्रथम 4 घंटे कफ दोष, द्धितिय 4 घंटे में पित्तदोष तथा तीसरे और अंतिम 4 घंटे में वातदोष प्रधान रहता है।
प्रथम भाग 4 घंटे (6 am to 10 am) – कफ दोष प्रधान रहता है।
द्धितिय भाग 4 घंटे (10 am to 2 am) में पित्तदोष प्रधान रहता है।
तीसरे भाग 4 घंटे (2 pm to 6 pm) में वातदोष प्रधान रहता है।
3.6.2 रात के आधार पर त्रिदोषों का जैविक चक्र (Biological rhythms of Tridosha on the basis of night)
रात के 12 घंटो के समय को 3 भागों में विभाजित किया जाए तो प्रथम 4 घंटे कफ दोष, द्धितिय 4 घंटे में पित्तदोष तथा तीसरे और अंतिम 4 घंटे में वातदोष प्रधान रहता है।
प्रथम भाग 4 घंटे (6 pm to 10 pm) – कफ दोष प्रधान रहता है।
द्धितिय भाग 4 घंटे (10 pm to 2 am) में पित्तदोष प्रधान रहता है।
तीसरे भाग 4 घंटे (2 am to 6 am) में वातदोष प्रधान रहता है।
3.6.3 उम्र के आधार पर त्रिदोषों का जैविक चक्र (Biological rhythms of Tridosha on the basis of age)
सम्पूर्ण जीवन के यदि हम उम्र के आधार पर 3 भाग माने तो बाल्यावस्था, युवावस्था एवं वृद्धावस्था यह मोटा वर्गीकरण कर सकते है।
बाल्यावस्था – कफ दोष प्रधान रहता है।
युवावस्था – पित्तदोष प्रधान रहता है।
वृद्धावस्था – वातदोष प्रधान रहता है।
3.6.4 खाने के आधार पर त्रिदोषों का जैविक चक्र (Biological rhythms of Tridosha on the basis of food intake)
| क्र. सं. | ||
| 1 | खाना खाने पर | – कफ दोष प्रधान रहता है। |
| 2 | जब खाना पचता रहता है तब | – पित्तदोष प्रधान रहता है। |
| 3 | जब खाना पच जाता है तब | – वातदोष प्रधान रहता है। |
3.6.5 ऋतु के आधार पर त्रिदोषों का जैविक चक्र (Biological rhythms of Tridosha on the basis of Ritu)
ऋतु अनुसार स्वाभाविक रूप से वात दोष का संचय, प्रकोप एवं प्रशमन
| क्र. सं. | वात दोष का | ऋतु |
| 1 | वात का संचय | ग्रीष्म ऋतु |
| 2 | वात का प्रकोप | वर्षा ऋतु |
| 3 | वात का प्रशमन | शरद् ऋतु |
ऋतु के अनुसार स्वाभाविक रूप से पित्त दोष का संचय, प्रकोप एवं शमन
| क्र. सं. | पित्त दोष का | ऋतु |
| 1 | संचय | वर्षा ऋतु में |
| 2 | प्रकोप | शरद ऋतु में |
| 3 | शमन | हेमन्त ऋतु में |
ऋतु के अनुसार स्वाभाविक रूप से कफ दोष का संचय, प्रकोप, शमन
| क्र. सं. | कफ दोष का | ऋतु |
| 1 | संचय | शिशिर |
| 2 | प्रकोप | बसन्त |
| 3 | शमन | ग्रीष्म |
3.7 आधुनिक शब्दावली में वात, पित्त एवं कफ (Vat, Pitta and Kaph according modern):
प्राचीन आर्चायों द्वारा बताये गये त्रिदोषों का आधुनिक शब्दावली में सामजस्य अत्यन्त दुष्कर कार्य है। आयुर्वेद मे वात, पित्त एवं कफ के गुणों एवं कर्मो को प्रधानता दी गई है और आधुनिक विज्ञान में रचना प्रधानता दी गई है।
आधुनिक विज्ञान के अध्ययन करते समय यदि सम दृष्टि से आयूर्वेद में जो वर्णन किया गया है, इस पर भी ध्यान दिया जाता है, तो आश्चर्यजनक समानता देखने में आती है।
- तंत्रिका तंत्र के गेंगलियोन के वितरण एवं उनके कार्यो का त्रिदोषों के शरीर में मुख्य स्थानो में समानता देखने में आती है।
- बायालोजिकल रिदम (Biological rhythm) में जो परिवर्तन शरीर में होते है वेसे ही वात, पित्त एवं कफ के कर्मो के अनुसार ही होते है। जैसे शरीर में जब पाचन अधिक हो रहा होता है, उसी समय पित्त की अधिकता का काल होता है। दिन एवं रात के मध्य काल में पित्त का काल होता है।
3.7.1 बायालोजिकल रिदम/जैविक लय (Biological rhythm)
जैविक लय (Biological rhythm) हमारे शरीर की आंतरिक प्रक्रियाओं में परिवर्तन का प्राकृतिक चक्र है। यह एक आंतरिक मुख्य घडी की तरह है, जो शरीर में सभी क्रियाओं के धटित होने के समय का समन्वय करती है और हर 24 घंटे में लगभग दोहराई जाती है।
3.7.2 क्रिर्कैडियन रिदम (Cricadian rhythm)
क्रिर्कैडियन रिदम एक प्राकृतिक, आंतरिक प्रक्रिया है, जो सोने-जागने के चक्र को नियंत्रित करती है। 24 घंटे के चक्र में होने वाले शारीरिक, मानसिक और व्यवहारिक परिवर्तन क्रिर्कैडियन रिदम हैं। ये प्राकृतिक प्रक्रियाएं मुख्य रूप से प्रकाश और अंधेरे के प्रति प्रतिक्रिया हैं। क्रिर्कैडियन रिदम का अध्ययन क्रोनोबायोलॉजी कहलाता है।
Circadian rhythms are physical, mental, and behavioral changes that follow a 24-hour cycle. These natural processes respond primarily to light and dark and affect most living things, including animals, plants, and microbes. Chronobiology is the study of circadian rhythms.
बायालोजिकल रिदम/जैविक लय का और अधिक विस्तृत अध्ययन करना चाहे तो आधुनिक विज्ञान के निम्न विषयों का अध्ययन किया जा सकता है-
- Physiological rhythms (body temperature, blood pressure, bronchial patency, etc).
- Rhythms for cognitive function.
- Rhythms for endocrine function.
- Rhythms for metabolites.
- Rhythms for organic molecules.
- Rhythms for cellular components.
- Rhythms for enzymatic activity.
3.8 प्रकृति निर्माण में दोषो का योगदान (Role of Dosha in the formation of Prakriti of an individual)
शुक्रशोणित संयोग काल में जिस दोष की उत्कट्ता होती है, उसी से व्यक्ति की प्रकृति उत्पन्न होती है। पुरुषबीज शुक्र और स्त्रीबीज शोणित के संयोग से गर्भ उत्पन्न होता है। शुक्र और शोणित वात, पित्त, कफ अर्थात त्रिदोष युक्त होते हैं। इनमें दोषों की कुछ न्यूनाधिकता हो सकती है। जब इन दोनों का संयोग होता है, तब दोनों के भीतरी त्रिदोषों का भी संयोग होकर वात से वात, पित्त से पित्त एवं कफ से कफ मिलकर गर्भ का त्रिदोष बनता है। इस त्रिदोष में संयोगवश: तीनों की जब समता होगी तब सम प्रकृति बनेगी और गर्भ की वृद्धि तथा प्रकृति भी यथोचित और स्वस्थ रहेगी। परन्तु इस प्रकार समता होना बहुत कठिन है। प्राय: कोई न कोई दोष प्रबल हो जाता है और उसी के अनुसार वातल, पित्तल इत्यादि प्रकृतियां बन जाती है। जब दो दोषों की प्रबलता होती है, तब द्विदोषज प्रकृतियां बनती है।
शुक्रशोणितसंयोगे यो भवेद्दोष उत्कट:।
प्रकृतिर्जायते तेन तस्या मे लक्षणं शृणु ।। (सु. शा. 4/63)
सप्तविधत्वं प्रतिपा। तस्या उत्पत्तौ हेतुमाह- शुक्रेत्यादि। यो भवेद्दोष उत्कट इति स्वभावस्थितो न प्रकुपित:। द्विविधा ह्युत्कटा वातादय: प्राकृता वैकृताश्चय तत्र प्राकृता: सप्तविधाया: प्रक्रृतेर्हेतुभूता: शरीरैकजन्मान:, वैकृताश्च गर्भव्याघातका:। गयी त्वन्यथैवाशङ्क्य समादधातिय यथा- ‘ननु, स्वभावत: शुद्धं बीजं कर्मणा वा समधातुं गर्भं निष्पादयति, अनिलादिदोषदुष्टं तु गर्भजननाय न समर्थमिति शुक्रशोणितशुद्धावुक्तं, तत् कथमुत्कटेन दोषेण प्रकृतिरिति? उच्यते- न हि सर्वमेव बीजं दूषितं किं तर्हि बीजावयवो दूषित:, न चावयवगतदोषेण गर्भप्रतिबन्धो जात्यन्धमूकादेर्गर्भस्य दर्शनात्, तस्माद्य एवांशोबीजस्य दुष्टो भवति तत्कार्यस्यैव गर्भावयवस्य विकृतिरभावो वा भवतिय यथा- दृष्ट्यारम्भके बीजभागे दुष्टे जात्यन्धो गर्भो भवति न तु गर्भ एव न भवति, तथा दोषाख्ये बीजभागे दुष्टे तत्कार्यस्यैव गर्भशरीरभावस्य समधातोरपेक्षया विकृति: स्फुटितकरचरणादिलक्षणा भवति न तु गर्भव्याघात:। तदुक्तं- ‘शुद्धं स्वभावकर्मभ्यां वाताद्यैर्दुष्टमंशत:। दृष्टं बीजार्थकृद् बीजं तत्र प्रकृतिरुत्तरम्’- इति (सु. शा. 4/63 डल्हण)
गर्भावक्रान्ति के समय अलग-अलग दोषों से बनी प्रकृतियों से दोषों का अनुशय (जन्मकाल से शरीर में रहने से अनुकूलता) होने से देह प्रकृति कहते हैं।
3.9 स्वास्थ्य बनाये रखने में दोषो का योगदान (Role of Dosha in maintaining of health)
3.10 प्राकृत दोष (Prakrita Dosha) वैकृत दोष (Vaikrita Dosha)
3.11 दोषो और षड रसो का सम्बन्ध (Reletionship between Rasa & Doshas)
तत्राद्या मारुतं घ्नन्ति त्रयस्तिक्तादय: कफम् ।
कषायतिक्तमधुरा: पित्तमन्ये तु कुर्वते ।
तत्र तेषु रसेषु मध्ये, आद्यास्त्रय: स्वाद्वम्ललवणा:, मारुतं घ्नन्ति शमयन्ति। अन्ये तु तिक्तोषणकषायास्तमेव चानिलं कुर्वते कोपयन्ति। तिक्तादयस्त्रयस्तिक्तोषणकषाया: कफं घ्नन्ति प्रशमयन्ति। अन्ये तु मधुराम्ललवणास्तमेव कफं कुर्वते। कषायतिक्तमधुरा: पित्तं घ्नन्ति। अन्ये त्वम्ललवणकटुकास्तदेव पित्तं कुर्वते। एतेनेदमुक्तं भवति। मधुरो वातपित्तघ्न: श्लेष्मकर:। अम्लो वातं हन्ति। कफपित्ते तु जनयति। लवणो मारुतं हन्ति, कफपित्ते तु कुरुते। तिक्त: कफपित्ते नाशयति, वातं तु जनयति। ऊषण: कफं नाशयति, वातपित्ते तु जनयति। कषाय: कफपित्ते हन्ति, वातं तु करोतीति।
मधुर अम्ल लवण रस वात का शमन करते है और तिक्त कटु कषाय रस वात का प्रकोप करते है
मधुर तिक्त कषाय रस पित्त का शमन करते है और कटु अम्ल लवण रस पित्त का प्रकोप करते है
तिक्त कटु कषाय रस कफ का शमन करते है और मधुर अम्ल लवण रस कफ का प्रकोप करते है

Very good sir
thanks dr