Koshtha

Spread the love

कोष्ठ (Kostha)

कोष्ठ शब्द की व्युत्पत्ति:-

कोष्ठ शब्द ‘कुश दाहे धातु से बना है। जिसका तात्पर्य जिसमें दाह या परिपाक की क्रिया हो उसे कोष्ठ कहते है।

कोष्ठ की रचना (Anatomy of Koshtha) :

चरकानुसार:- आचार्य चरक के अनुसार महास्रोत शरीर मध्य, महानिम्न, आमाशय और पक्वाशय इन्हे कोष्ठ कहा है।

‘‘कोष्ठ: पुनरूच्यते महास्रोत: शरीर मध्यमहानिम्न आमपक्वाशयश्चेति।’’  (च. सू. 11/48)

तस्य हि कोष्ठग्रहणेनैव ग्रहणम्य अनेन न्यायेन यकृत्प्लीहाश्रितं च शोणितं कोष्ठत्वेनैवाभिप्रेतमिति बोद्धव्यं, समानन्यायत्वात्। (च. सू. 11/48 पर चक्रपाणी)

सुश्रुतमतानुसार:- आठ अवयवो को मिलाकर अर्थात  अन्ताधि (शरीर मध्य) को कोष्ठ की संज्ञा दी हैं।

‘‘स्थानान्यामाग्नि पक्वानां मूत्रस्य रूधिरस्य च।

हृदुण्डुक: फुफ्फुसश्च कोष्ठ इत्याभिधीयते’’     (सु. चि. 2/12)

उपरोक्त विवरण से शरीर के आकाश (रिक्त) स्थान कोष्ठ बताये गये है।

आधुनिक दृष्टि से शरीर में तीन प्रमुख रिक्त स्थान है, जिन्हे गुहाऐ (cavity) कहते है।

1 वक्ष गुहा (Thoracic cavity)

2 उदर गुहा (Abdomial cavity)

3 श्रोणी गुहा (Palvic cavity)

आधुनिक दृष्टि से इसे धड (Trunk) भी कहते है। इसको कोष्ठ मानने पर चरक एवं सुश्रुत दोनो के मतो का समावेश हो जाता है और आधुनिक के अनुसार बताई गई तीनो गुहाओ (cavities) का ज्ञान भी हो जाता है।

महास्रोत (alimentary Canal):-

आयुर्वेद के महास्रोत शब्द से आधुनिक में गलविवर से गुदापर्यन्त (alimentary Canal) लम्बे स्रोत का ग्रहण किया जाता है। यह स्रोत तीन भागो मे विभक्त है।

  1. गल विवर से आमाशय तक – उध्र्व भाग
  2. गहणी से क्षुदान्त्र तक – मध्य भाग
  3. उण्डूक से गुदपर्यन्त तक – निम्न भाग

कोष्ठ की क्रिया अनुसार कोष्ठ के भेद (Types of Kosth according response) :

प्राकृतिक रूप से प्रत्येक व्यक्ति की आंत्र की गति में भिन्नतायें होती है। एवं किसी आहार पदार्थ के प्रतिक्रियाये भी भिन्न भिन्न होती है। प्राचीन आचार्यों ने आंत्र की गति एवं प्रतिक्रियाओं के आधार पर कोष्ठ के तीन समुह बनाये है।

इन कोष्ठ के तीन प्रकारों को क्रूर  कोष्ठ, मध्यम कोष्ठ एवं मृदु कोष्ठ कहा जाता है।

१. मृदुकोष्ठ

जिसकी ग्रहणी कला में पित्त – प्रबल, कफ – न्यून एवं वात – मंद रहती है ‘वह मृदु कोष्ठ’ व्यक्ति है। उसका सूखपूर्वक विरेचन होता है। दुग्ध पान से ही विरेचन हो जाता है।

विरेच्य द्रव्य – गुड, दूध, इक्षुरस, मस्तु, शर्करा, काश्मर्य, त्रिफला, द्राक्षारस।

२. क्रूर कोष्ठ

गुड, दूध, इक्षुरस, मस्तु, शर्करा, काश्मर्य, त्रिफला, द्राक्षारस से भी विरेचन नही हो, ऐसे प्रबल वात वाले व्यक्ति का कोष्ठ क्रूर होता है। कुटकी से विरेचन हो पाता है।

३. मध्यम कोष्ठ

जो क्रूर कोष्ठ एवं मृदु कोष्ठ के मध्य का हो। ऐसे व्यक्ति में निशोथ से विरेचन हो जाता है।

कोष्ठ के भेदौ का दोषो से सम्बन्ध (Relation between Koshtha and Dosha)

गुडमिक्षुरसं मस्तु क्षीरमुल्लोडितं दधि।

पायसं कृशरां सर्पि: काश्मर्यत्रिफलारसम्। 

द्राक्षारसं पीलुरसं जलमुष्णमथापि वा।

मद्यं वा तरुणं पीत्वा मृदुकोष्ठो विरिच्यते। 

विरेचयन्ति नैतानि क्रूरकोष्ठं कदाचन।

भवति क्रूरकोष्ठस्य ग्रहण्यत्युल्बणानिला।

उदीर्णपित्ताऽल्पकफा ग्रहणी मन्दमारुता।

मृदुकोष्ठस्य तस्मात् स सुविरेच्यो नर: स्मृत:। (च.सू. 13/66-69)

मृदुकोष्ठादिलक्षणमाह- मृद्वित्यादि। अभ्यर्हितत्वात् कोष्ठज्ञानस्यान्यथाऽपि तल्लक्षणमाह- गुडमित्यादि। उल्लोडितं दधिसर:। कृशरा तिलतण्डुलमाषकृता यवागू:; वचनं हि- तिलतण्डुलमाषैस्तु कृशरा त्रिसरेति च। क्रूरकोष्ठाविरेचनहेतुमाह- भवतीत्यादि।  ग्रहणी कोष्ठस्थाग्न्यधिष्ठानभूता नाडीय यदुक्तम्- अग्न्यधिष्ठानमन्नस्य ग्रहणाद्ग्रहणी मता (च.चि.15) इति उदीर्णपित्तेत्यादि मृदुकोष्ठस्वरूपकथनम्।  क्रूरकोष्ठस्य ग्रहणीगतो वायुर्गुडादीनां सरत्वं प्रतिबध्नाति, मृदुकोष्ठस्य हि ग्रहण्यां विरोधको वायुर्नास्ति, स्तम्भकोऽपि श्लेष्माऽल्प:, उद्भूतसरत्वगुणं च पित्तं प्रबलंय तेन गुडादिभि: सुखं विरेचनं भवतीति भाव:। (च.सू. 13/66-69 पर चक्रपाणि)

This Post Has One Comment

  1. Aalok kumar

    Thanks for easy explanation of this topic ( कोष्ठ ), with references.

    I cordially thanks for comparative explanation of the both legend books CHARAK and SHUSHRUTA..

Leave a Reply