12.1 आहार पाक (Process of Digestion)
आयुर्वेद मे पाचन क्रिया (Digestion) को आहार पाक के रुप में जाना जाता है। आहार पाकक्रम अर्थात आहार गुणो का शरीर-सम गुण-भाव प्राप्त करना।
चरक मत से आहारद्रव्य का जाठराग्नि द्वारा पूर्व में पाचन होता है, तत्पश्चात् पांचो महाभूतो की पंचाग्नियों की क्रिया द्रव्य में अपने अपने महाभूत प्रधान अंश पर होती है, तत्पश्चात् आहाररस का धात्वाग्नियों द्वारा पाक होकर अपने धातुओं में परिणिति होती है। आहार गुणों का शरीर गुण भाव प्राप्त करना पाचन कहलाता है। पाचन क्रिया के सम्बन्ध में चरक चिकित्सा स्थान में स्पष्ट रूप से लिखते है –
अन्नमादानकर्मा तु प्राण: कोष्ठं प्रकर्षति।
तद्द्रवैर्भिन्नसंघातं स्नेहेन मृदतां गतम्।।
समानेनावधूतोऽग्निरुदर्य: पवनेन तु।
काले भुक्तं समं सम्यक् पचत्यायुर्विवृद्धये।।(च. चि. 15/5)
एवं रसमलायान्नमाशयस्थमघ: स्थित:।
पचत्यग्निर्यथा स्थाल्यामोदनायाम्बुतण्डुलम्।। (च.चि.15/7)
सम्प्रति सम्प्राप्तस्यान्नस्याग्निना यथा पाको भवति, यथा च पच्यमानमन्नं देहधात्वादिरूपतामापद्यते, तदाह- अन्नमित्यादि। मुखप्रवेशादारभ्यान्नस्य व्यापार इहोच्यते। आदानमाहारप्रणयनं कर्म यस्य स तथा, प्रकर्षतीति नयति। द्रवैरिति पानीयादिभि:।भिन्नसङ्घातमिति अवयवशैथिल्यमापन्नम्। काले इति बुभुक्षाकाले। भुक्तं सममिति मात्राप्रकृत्यादिसमम् समानेनावधूत इति अग्निपाश्र्वस्थितेन समानेन सन्धुक्षित:, अयं च समान: प्राकृतत्वाद् बाह्यो वायुरिव अग्ने: सन्धुक्षणो भवति न वैषम्यकर:, विकृतस्तु वैषम्यं करोतिय तेन वातेन विषमोऽग्निर्भवतीति चोपपन्नं भवति। एते च द्रवादय: पाचकस्याग्ने: सहाया भवन्तीत्यनेन ग्रन्थेनोच्यतेय ‘आहारपरिणामकरास्त्विमे भावा भवन्तिय तद्यथा- ऊष्मा, वायु:, क्लेद:, स्नेह:, काल:, समयोगश्च’ (शा.अ.6) इति। उदर्य: पाचक इत्यर्थ:। ‘‘पवनोद्वह’’ इत्यग्निविशेषणं केचित् पठन्ति। सम्यगिति भुक्तविशेषणं केचित् पठन्तिय तदा सम्यगित्यनेन मात्रासाम्यमुच्यते। सम्यग्ग्रहणेन तु प्रकृत्यादिसम्पदुच्यते। आयुर्विवृद्धये इति शरीरेन्द्रियसत्त्वात्मसंयोगानुवर्तनाय तद्विवृद्धये च। रसमलायेति तादथ्र्ये चतुर्थी। आशयस्थमिति आमाशयस्थम्। अध:स्थित इत्यनेन अग्नेरूध्र्वज्वलनस्वभावतया ऊध्र्वस्थान्नपाके सामथ्र्यं सूचयति। अत्रार्थे यथेत्यादिना दृष्टान्तमाह ।। (च. चि. 15/5-7 पर चक्रपाणि)
अर्थात आदानकर्म वाला प्राण, वायु (निगलने की क्रिया द्वारा) अन्न को कोष्ठ में ले जाता है फिर (अन्न में उपस्थित तथा अन्न प्रणाली की भित्ति से उत्पन्न) द्रव पदार्थ उस अन्न के संघात को छिन्न-भिन्न कर देते है एवं स्नेहन द्वारा वह अन्न संघात मृदु (soft) हो जाता है। अन्न-क्लेदन में आमाशय में स्थित क्लेदक कफ, हेतु होता है। इसके पश्चात (उचित) काल में समयोग (उचित संयोग तथा मात्रा) में खाये गये छिन्न-भिन्न और मृदु आहार को समानवायु द्वारा प्रेरति पाचकाग्नि (पाचक पित्त) उसी प्रकार अपनी क्रिया कर उसका पाचन करती है, जिस प्रकार बर्तन में रखे हुए चावल और जल को नीचे से दी हुई अग्नि पकाकर भात एवं मांड को पृथक कर देती है। इस प्रकार पाचकग्नि, आमाशय (ग्रहणी क्षुदान्त) में स्थित अन्न को पचाकर रस (प्रसादांश) तथा मल (किट्टांश) में परिवर्तित कर देती है।
आहार पाचन को दो भागों में विभक्त किया जा सकता हैं-प्रथम तो लोक में होने वाला तथा द्वितिय शरीर में होने वाला।
पुन: शरीर में होने वाले आहार पाचन को दो भागों में विभक्त किया जा सकता हैं-प्रथम आहार का स्थूल पाक जो महास्रोत में होता है तथा दुसरा सूक्ष्म पाक जो भूताग्नियों एवं धात्वग्नियों द्वारा सारे शरीर में सतत् होता रहता है। प्रथम स्थूल पाक को अवस्था पाक कहते है, इसमें मुख्यत: जठराग्नि का कार्य होता हैं। महास्रोत स्थूल पाक का पाकक्षेत्र है। महास्रोतस में पाचन होने के बाद अन्न से अन्न रस बनता है एवं तद्न्तर सार-किट्ट विभाजन होकर शरीर में शोषण होने योग्य आहार रस का निर्माण होता है।
इसके बाद भूताग्नि एवं धात्वग्नियों द्वारा सूक्ष्म पाक होता है। इस पाचन में आहार रस से धातु, उपधातु एवं मलादि की उत्पत्ति एवं पोषण होता है।
12.2 अन्नवह स्रोतस (Annavaha Srotas)
अन्नवह स्रोतस अन्न को वहन करने वाला स्रोतस है। आहार की अन्न संज्ञा पाचन होने तक ही रहती है। पाचन का कार्य आहारनाल (Alimentary tract/canal) के क्षुद्रान्त (Small intestine) भाग तक होता है। उसके बाद मुख्य रूप से अवशोषण का कार्य होता है। अत: आहारनाल का मुख गुहा से लेकर क्षुद्रान्त तक का भाग अन्नवह स्रोतस में माना जा सकता है। इसके पश्चात का आहारनाल का भाग पुरीषवह स्रोतस में गिना जाना चाहिये
12.2.1 अन्नवहस्रोतस के पर्याय (Synonyms of Annavaha Shrotas)
अन्नमार्ग, अन्नवहस्रोतस, आमाशय, आमपक्वाशय, कुम्भ, कोष्ठ, पक्तिमार्ग, भुक्तमार्ग, महास्रोत। इन पयार्यो से अन्नवह स्रोतस का ग्रहण किया जाता है। इन पर्याय शब्दों का व्यवहार किया जाता है।
आधुनिक विद्वान जिसे एलीमैण्टरी केनाल कहते है, उसके समक्ष आयुर्वेदज्ञो ने अनेक शब्दों का प्रयोग किया है।
अन्ननलिका से गुद तक का मार्ग, जिसेगेस्ट्रो इन्टेस्टाइनल ट्रेक्ट (gastrointestinal tract) कहा जाता है, इसे महास्रोत भी कहा जाता है। परन्तु इसमें अन्ननलिका से क्षुदान्त्र तक भाग अन्नवह स्रोतस तथा शेष नीचे का गुदपर्यन्त भाग पुरीषवह स्रोतस माना जाता है। दोनो स्रोतस में भेद का ज्ञान करने के लिए हम यह कह सकते है कि आहार नाल मे जहा तक खाये हुये आहार को अन्न कहते है, वहा तक अन्नवह स्रोतस एवं जहा से अपचित अंश की पुरीष संज्ञा होती जाती है, वहा से पुरीषवह स्रोतस माना जाये।
12.2.2 अन्नवह स्रोत का निर्माण (Origin of Annavaha Srotas)
मातृजभाव से अन्नवह स्रोतस की उत्पत्ति होती हैं। मांस, रक्त, मेद, मज्जा, ह्नदय, नाभि, यकृत, प्लीहा, आत्र, गुदा इत्यादि अवयव मातृज भावयुक्त होते हैं। अत: इन्हीं अंगों में सम्पूर्ण अन्नवह स्रोत तथा महास्रोत का समावेश होने से मातृजभाव ही अन्नवह स्रोतस की उत्पत्ति में सहायक है।
12.2.3 अन्नवह स्रोत का भौतिक स्वरूप (Panchabhotik composition)
सर्व द्रव्यं पांचभौतिकमस्मिन्नर्थे।। (च.सू. 26/10)
इस वचन के आधार पर अन्नवहस्रोतस के भौतिक संगठन को देखते है तो मुख्य रूप से सम्पूर्ण महास्रोत वायु, आकाश एवं अग्नि महाभूत प्रधान है। परन्तु अन्नवह स्रोत की स्थिति मुख से क्षुद्रान्त के अन्तिम भाग तक होने से इसका भौतिक स्वरूप इस प्रकार हो सकता है:-
स्थान महाभूत कारण
मुख आप्य महाभूत बोधक कफ की स्थिति के कारण आहार की क्लिन्नता रसानुभुति से।
ग्रसनी/अन्ननलिका वायु एवं आकाश महाभूत प्रधान आहार को आमाशय में भेजने से।
आमाशय जल एवं अग्नि महाभूत प्रधान कफ एवं पित्त का स्थान होने से
क्षुद्रान्त अग्नि एवं वायु महाभूत प्रधान भोजन का पाचन, अवशोषण एवं मलादि का आगे निस्सरण होने से
12.2.4 अन्नवह स्रोत के अवयव (Component of Annvaha Srotas)
मुख (Mouth),मुखगुहा (Oral cavity), ग्रसनी या अन्ननलिका (Oesophagus), आमाशय (Stomach), ग्रहणी (Deudonuim), क्षुद्रान्त (small intestine) मुख्य अवयव है।
12.2.5 अन्नवह स्रोतस के मूल (Moola of Annvaha Srotas)
चरकमतेन – अन्नवहानां स्रोतसां आमाशयोमूलं वामंच पाश्र्वम्। (च.वि.5)
सुश्रुतमतानुसार – अन्नवहे द्वे, तयोर्मूलं आमाशयोऽन्नवाहिन्यश्रा: धमन्य:। (सु.शा.9)
अन्न का वहन करने वाला स्रोतस अन्नवह स्रोतस कहलाता हैं। आचार्य चरक ने अन्नवहस्रोतस का मूल आमाशय तथा वाम पाश्र्व बतलाया हैं, किन्तु आचार्य सुश्रुत ने अन्नवहे द्वे कहकर उनका मूल आमाशय तथा अन्नवाहिनी धमनियॉ बताया है। इस प्रकार अन्नवहस्रोतस का मूल आमाशय को तो दोनों आचार्यो के अनुसार मूल माना ही गया है।
आमाशय (Amamshaya)
आमाशय की यदि व्याख्या की जावें तो शास्त्र के अनुसार नाभि तथा ह्नदय के बीच का प्रदेश आमाशय है।
हन्नाभ्योरन्तरे जन्तो: आमाशय इति स्मृत:।
अर्थात् आमाशय से नाभि के उध्र्व का उदर का सम्पूर्ण प्रदेश समझा जाता है। आहार के ग्रहण करने पर उसका जिस अंग तक आम रूप रहता है, वहाँ तक आमाशय होना चाहिए। अत: आमाशय शब्द से मुख तथा अन्नवहस्रेातस दोनों का ग्रहण अभीष्ट हैं। अर्थात् मुख, ग्रसनिका, आमाशय तथा क्षुद्रान्त का अग्र भाग (ग्रहणी) आमाशय के अन्तर्गत आने चाहिए। क्योंकि भोजन का आम रूप (अवयव रूप) क्षुद्रान्त के ग्रहणी अंग तक रहता है। ग्रहणी में पाचन होकर सार तथा किट्ट भाग में विभाजन क्षुद्रान्त के अन्तिम भाग में होता है। इस प्रकार आयुर्वेद शास्त्रानुसार आमाशय की स्थिति पच्यमानाशय तक होती है।
इसीलिए अन्नवह स्रोतस के पर्याय के रूप में भी आमाशय को कहा गया है।
वामपाश्र्व (Vaamparshva)
चरक ने आमाशय मूल के साथ ही ‘‘वामपाश्र्वम्’’ को भी अन्नवह स्रोतस का मूल कहा है। वामपाश्र्व नाम से शरीर में कोई अंग नहीं होता है।
आमाशय के वामपाश्र्व में प्लीहा रहता है, जिसका अन्नवह स्रोतस के मूल से कोई भी सम्बन्ध स्थापित्त नहीं किया जा सकता है, अर्थात् प्लीहा का पाचनतंत्र की क्रिया में सीधे तोर पर कोई भी योगदान नहीं है।
शरीर में आमशयिक क्षेत्र के वाम भाग में कोई भी ऐसा अंग नहीं है जिसका अन्नवह सा्रेतस से सम्बन्ध किया जा सकें। अत: इसका अर्थ यह भी किया जा सकता है कि आमाशय शरीर में (उदर में) वामपाश्र्व में रहता है। खाली स्थिति में उसका आकार अनियमित थैली के समान रहता है। आहार ग्रहण करने पर वह फूलता है, जिससे वामपाश्र्व (left lateral) में भी उत्सेध प्रतीत होता हैं तथा विकृत होने पर भी वामपश्र्व में ही शूल (Pain), अधिक उत्सेध आदि लक्षण दिखाई देते हैं, इसको देखकर ही चरकाचार्य ने वामपाश्र्व का उल्लेख किया होगा। अत: भरा हुआ स्टमक ही वामपाश्र्व से समझा जाना लेखक को उचित प्रतित होता है।
यदि आमाशय की स्थिति क्षुद्रान्त पच्यमानाशय तक माने तो उसके वामपाश्र्व में आमाशय का भाग, कुछ अग्नाशय का भाग तथा कुछ मघ्यान्त्र का भाग आता है, इनका पाचन से सम्बन्ध तो हैं, परन्तु वामपाश्र्व शब्द का इससे स्पष्टीकरण नहीं होता है।
नाभि स्तनान्तरं जन्तोरामाशय इति स्मृत:। (च.वि.)
अत: अन्नवह स्रोतस (चरकोक्त) का मूल वह आमाशय है जो कि नाभि ओर स्तनो मध्य है। (आमाशय एवं सम्पूर्ण क्षुद्रान्त) एवं जिसका प्रथम भाग अधिकांशत: वामपाश्र्व में (मध्यरेखा से बाई ओर) स्थित होता है।
अन्नवाहिनी धमनियां (Annavahini Dhamanya)
सुश्रुताचार्य ने आमाशय मूल के साथ-साथ अन्नवाहिनी धमनियां को भी अन्नवह स्रोतस का मूल माना है। अन्नरस का वहन करने वाली आंत्रो में स्थित सिराओं तथा धमनियाँ जो कि अपने अपने मार्गो से अन्नरस का वहन करती है, को अन्नवाहिनी धमनियाँ माना जा सकता है। सुश्रुत के धमनी शब्द से पाचनतंत्र अन्नवहस्रोतस के अंगों पर नियन्त्रण करने वाली नाडियों को भी अन्नवाहिनी धमनियां माना जा सकता है परन्तु इनका अन्नवहन में कोई सहयोग प्रत्यक्षत: प्रतीत नहीं होता है।
अत: कुछ लोगो के अनुसार अन्नवाहीनी धमनीयो से इसोफेगस और छोटी आंत अर्थ लिया गया है, जो कि आमाशय के दोनो ओर जुडी रहती है।
12.2.6 अन्नवह स्रोतस के कार्य (Function of Annvaha Srotas)
अन्नवह स्रोतस में समाविश्ट प्रत्यंगो को अनेक कार्य करने होते हैं। अन्न या खाद्य पेय पदार्थों को ग्रहण करना, उनको चबाना, उनका पाचन करना, उनमें से मल और प्रसाद भाग को अलग करना (सार किट्ट विभजन), मल भाग का शरीर के बाहर निस्सरण करना और प्रसाद भाग का (अन्नरस के रूप में) शोषण करना।
स्थूल रूप में अन्नवह स्रोतस के अन्तर्गत सम्पूर्ण महास्रोतस समाविश्ट किया जा सकता है, परन्तु विशेषत: मुख अन्ननलिका, आमाशय, ग्रहणी, मध्यान्त्र, एवं शेषान्त्र, अन्नवहस्रोतस के अन्तर्गत मानते है। क्योंकि आहार द्रव्यों का मुख से ग्रहण करने पर इन्हीें प्रत्यंगो में उसका विभिन्न रसो द्वारा एवं क्रियाओं द्वारा पाचन होकर अन्नरस बनता है। महास्रोत का नीचे का शेष भाग पुरीषवह स्रोतस के अन्तर्गत आता है।
12.2.7 अन्नवह स्रोतस की दुष्टि (Mal functioning of Annvaha Srotas)
अन्नवह स्रोतस की दुष्टि के निदानों का अर्थात् दुष्टि करने वाले कारणों का वर्णन इस प्रकार है:-
अन्नवह स्रोतस की दुष्टि के आहारजन्य कारण निम्न है:-
अ. अहित भोजन (harmful Diet)
ब. अतिमात्रा में भोजन (ExcessiveDiet)
स. अकाल (असमय) भोजन (Untimely diet)
द. विरूद्ध भोजन (contrary Diet) करना आदि।
अन्नवह स्रोतस की दुष्टि के विहारजन्य कारण निम्न है:-
अ. अतिव्यायाम (Excessive exertion)
ब. अव्यायाम (No exercise )
स. शोक (sadness)
द. अतिमेथून (excessive libido)
य. वेग संधारण (avoiding natural urge )आदि।
12.2.8 अन्नवह स्रोतस की दुष्टि के लक्षण (Sign of Mal functioning of Annvaha Srotas)
आहार अथवा विहारजन्य कारणों से जब अन्नवह स्रोतस दूषित हो जाता है तो कुछ लक्षणों से पहचाना जा सकता है। इन लक्षणें से अन्नवह स्रोतस की दूष्टि सुनिश्चित होने पर इसस्रोतस पर कार्यकरने वाली औषध का प्रयोग कर इस दूष्टि को ठीक किया जा सकता है।
चरकानुसार –
अनन्नाभिलशण अरोचक अविपाकच्छर्दिश्च दृष्टवा ………।। (च.वि.5)
अन्नवह स्रोतस के विकृत होने पर अन्न का अच्छा न लगना, मुँह में रूचि न होना, अपचन, वमन ये लक्षण दिखाई देते है।
सुश्रुतानुसारलक्षण
‘‘तत्र विद्धस्माध्मानं शुलोऽन्नद्वेषच्छर्दि: पिपासाऽऽन्ध्यं मरणच:।।’’ (सु.शा.9)
आध्मान (Abdominal discomfort), वेदना (Pain), अन्न में अरूचि, प्यास (Thirst), अंधापन (Blindness) ये लक्षण दिखाई देते हैं। सुश्रुत के वचनों में विकृति के जो लक्षण है। उनमें ‘आन्ध्यम्’ यही एक विशिष्ट लक्षण हैं, अन्य सभी लक्षण चरकाचार्य द्वारा बताये गये लक्षणों के समान ही मिलते हैं। आचार्यों की दूरदृष्टी तथा निरीक्षण प्रवृति कितनी तेज थी, यह इसका एक उदाहरण मात्र है। आधुनिक विज्ञान में दृष्टि के लिए ‘‘अ’’ जीवनसत्व (Vitamin A) उपयोगी माना जाता है, जिसे हम आहार द्वारा ही ग्रहण करते हैं। अत: जब आहार लेने की जब इच्छा ही खत्म जाती है, तब इसकी शरीर में कमी उत्पन्न हो जाती है। इसी को लक्ष्य कर अधंता, दृष्टिमॉंद्य जैसे लक्षण सुश्रुताचार्य ने दिये है।
12.3 अवस्थापाक – जठराग्नि पाक, स्थूल पाक
अन्नस्य भुक्तमात्रस्य षड्रसस्य प्रपाकत:
मधुराद्यात् कफो भावात् फेनभूत, उदीर्यते ।।
परं तु पच्यमानस्य विदग्धस्याम्लभावत:।
आशयाच्च्यवमानस्य पित्तमच्छमुदीर्यते।।
पक्वाशयं तु प्राप्तस्य शोष्यमाणस्य वह्निना।
परिपिण्डितपक्वस्य वायु: स्यात् कटुभावत:।। (च. चि. 15/9-11)
एवं स्थूलपाकक्रममभिधाय, अवान्तरमणुपाकक्रममाह- अन्नस्येत्यादि। भुक्तमात्रस्येति भुक्तानन्तरमेव। षड्रसस्येति प्राशस्त्येनाभिधानं, किंवा षड्रसस्यापि प्रथमं मधुरता निरुक्ता भवतीति दर्शयति। प्रपाकत इति प्रथमपाकत:य प्रशब्द आदिकर्मणि। मधुरश्चासौ आद्यश्चेति मधुराद्य:य किंवा ‘मधुरात् प्राक् कफो भावात्’ इति पाठ:। फेनभूत इति फेनसदृशोऽघन इत्यर्थ:। परमिति आद्यमधुरपाकानन्तरम्। विदग्धस्येति पक्वापक्वस्य। अम्लभावा इति जाताम्लस्वरूपत:। आशयात् आमाशयात्। च्यवमानस्य अधोभागं वायुना नीयमानस्य, अनेन च पित्तस्थानसम्बन्धं विदग्धाहारस्य दर्शयति। अच्छमिति अघनम्। उदीर्यते इति पित्तमुत्पद्यतेय अम्लं च पित्तमम्लभावादाहारस्य उत्पद्यत इति युक्तमेव। पक्वाशयं तु प्राप्तस्येति मलरूपतया पक्वाशयं गतस्य। शोष्यमाणस्य वह्निनेति यद्यप्यूध्र्वदाहक्षमो वह्नि:, तथाऽप्यस्याधोगतस्य वह्निना शोष्यमाणत्वं पक्वाशयगतस्याप्युपपन्नम्। यतश्चाधोगमने सम्यग्वह्निव्यापारो नास्ति, अत: ‘पच्यमानस्य’ इति पदं परित्यज्य ‘शोष्यमाणस्य’ इति कृतम्। परिपिण्डितपक्वस्येति परिपिण्डितरूपतया मलरूपतया पक्वस्य। वायु: स्यात् कटुभावत इति परिपिण्डितावस्थोद्भूतकटुता वायोरुत्पद्यते। एवमीदृश: षड्रसाहारस्यावस्थापाको भवति। ननु यद्यत्रावस्थापाकवशात् षण्णामेव रसानां कफादिकर्तृत्वमुच्यते, तदा ‘कटुतिक्तकषायाणां विपाक: प्रायश: कटु:’ (सू.अ.26) इत्यादिना यो विपाक उच्यते स विरुध्यते, अवस्थापाकेनैव बाधितत्वात्य मैवं, नह्यवस्थापाकोऽयं रसस्वभावं निष्ठापाकं बाधते, किन्त्ववस्थायां स्वकार्यं करोतिय तेन रसादयोऽपि स्वकार्यं कुर्वन्ति, अवस्थापाकोऽपि स्वकीयं कार्यं करोतिय यथा- मधुरतिक्तादिषड्रसेऽन्ने उपयुक्ते मधुरोऽपि स्वकार्यं करोति, तिक्तादयश्च स्वकार्यं कुर्वन्तिय अयं तु विशेष:- यन्मधुराख्यस्यावस्थापाकस्य मधुरादय: श्लेष्मजनका रसा अनुगुणा भवन्ति तदा स बहुश्लेष्माणं जनयति, यदा त्ववस्थापाको विपरीतकटुकादिपरिगृहीतो भवति तदा स्तोकमात्रं कफं जनयतिय एवं पित्तजनकेऽवस्थापाकेऽपि वाच्यम्। ‘कटुतिक्तकषायाणां’ (सू.अ.26) इत्यादिनोक्तस्त्रिधा विपाकस्तु रसमलविवेकसमकालो भिन्नकाल एवावस्थापाकै: सममिति न विरोध:। स च भिन्नकालोऽप्यवस्थापाककार्यदोषानुगुणतयाऽननुगुणतया वा अवस्थापाकाहितदोषाणां वर्धनं क्षपणं वा करोतीति तस्याभिधानं शास्त्रे प्रयोजनवदेव। यद्यपि सर्वमन्नमवस्थायां विदह्यते, तथाऽपि येऽत्यर्थं विदाहिनस्त एव ‘विदाहिन:’ इत्युच्यन्ते, विशेषविदाहकर्तृत्वात्। अन्ये त्वाहु:- न षड्रसादप्यन्नात् सामान्येनावस्थापाके कफाद्युत्पत्ति:, किन्तु षड्रसादप्यन्नात् प्रथमे पाके मधुरोऽयमुद्भूतो रस: स कफं जनयति, तथा पित्तं विदाहावस्थायामुद्भूतादम्लरसादुत्पद्यते, एवं वायुरपि आहारकटुतावस्थायां भवतीति। अन्ये त्वाहु:-यत्नान्नस्याग्निसंयोगान्मधुराद्यावस्थिकं भवति, किन्तु कफादिस्थानेषु मनुष्याणां स्वभावादेव मधुरादयो रसास्तिष्ठन्ति, ते चान्नं स्वस्वभावं नीत्वा कफादीञ्जनयन्ति। उक्तं हि तन्त्रान्तरे- ‘मधुरो हृदयादूध्र्वं रस: कोष्ठे व्यवस्थित:। तत: संवर्धते श्लेष्मा शरीरबलवर्धन:।। नाभीहृदयमध्ये च रसस्त्वम्लो व्यवस्थित:। स्वभावेन मनुष्याणां तत: पित्तं विवर्धते।। अधो नाभ्यास्तु खल्वेक: कटुकोऽवस्थितो रस:। प्राय: श्रेष्ठतमस्तत्र प्राणिनां वर्धतेऽनिल:।। तस्माद्विपाकस्त्रिविधो रसानां नात्र संशय:’ इति। इह तु तत्रेत्यादिग्रन्थार्थालोचनया यथोक्त एव ग्रन्थार्थो न्याय्य:। तन्त्रान्तरे तु श्लेष्मपित्तगतमधुराम्लरसौ वर्णयन्ति, ते कफाद्यधिगता रसा अस्माकमपि पाकसहकारितया अनुमता एव। यत्तु श्लेष्मजनकांशस्यैवावस्थापाके श्लेष्मकर्तृत्वमित्युक्तं, तदनुमतमेवय एवं य: श्लेष्मजनकोंऽश आहारगत: स स्थानमहिम्ना तदाहारस्य मधुरतामापाद्य श्लेष्माणं विशेषेण जनयतीति ब्रुम:। यत्तु, अनेनावस्थापाकेन कफपित्तयोरीरणमात्रं क्रियते नतु वृद्धि:, वृद्धि: निष्ठापाके एव भवतीति वदन्ति, तदुपपत्तिशून्यं भातिय किञ्च, अवस्थापाकात् कफपित्तयोर्वृद्धि:, तथा निष्ठापाकाच्च मलरूपतया उत्पाद इति युक्तं पश्याम:।।(च. चि. 15/9-11 पर चक्रपाणि)
महास्रोत में समागत नानाविध आहार पर पाचन क्रिया आरम्भ हो जाती हैे। आहारनाल के उपरी भाग में अर्थात अन्नवह स्रोतस के विभिन्न भागों में आहार भिन्न भिन्न अवस्थाओं में रहता है। जैसे मुख में चबाने एवं लार समिश्रण के पश्चात आहार को आधुनिक विज्ञान में ‘बोलस’ की संज्ञा दी गई है। तत्पश्चात जठर रस मिश्रण के बाद चाइम तथा छोटी आंत में चाइल कहा जाता है। इन तीनो अवस्थाओं में आहार के रासायनिक एवं भौतिक स्वरूप में भिन्नता होती है। आयुर्वेद शास्त्र में इन्ही आहार की विभिन्न अवस्थाओं को मधुर अवस्था आदि एवं इन अवस्थाओं में होने वाले पाक को मधुरादि अवस्था पाक कहते है। पाचन काल में आहार द्रव्यों में जो परिवर्तन होते है वे तीन अवस्थाओं में गुजरते है। पाचन की ये तीन अवस्था निम्न हैं –
१. मधुर अवस्था पाक (Madhur Avastha Pak)
२. अम्ल अवस्था पाक (Amla Avastha Pak)
३. कटु अवस्था पाक (Katu Avastha Pak)
12.3.1 मधुर अवस्था पाक (Madhur Avastha Pak)
सर्वप्रथम आहार द्रव्य मुख द्वारा ग्रहण किये जाते है तो मधुर अवस्था पाक होता हैं। मधुर अवस्था पाक में सम्पूर्ण षड्रस युक्त आहार मधुरता को प्राप्त होता है अर्थात् सम्पूर्ण आहार मधुर रस में परिवर्तित हो जाता है। उस परिवर्तित आहार रस में जो फेन होता है, उससे कफ बढ़ जाता हैे। यह मधुर अवस्था पाक मुख से आरम्भ होकर आमाशय तक होता है। उध्र्व आमाशय विशेषत: कफ का स्थान होने से यह अवस्था पाक विशेष रूप से आमाशय में होता है।
षड् रस युक्त अन्न के मुख में जाते ही अपने रस एवं गन्ध के द्वारा मुख से लाला स्राव और आमाशय से पाचक रसों का स्राव होता है। मुख में बोधक कफ और आमाशय में क्लेदक कफ और पाचक पित्त का स्राव अन्न से ही होता है। बोधक कफ का उदीरण प्राण और उदान वायु द्वारा तथा पाचक पित्त का उदीरण समान वायु के द्वारा होता हैं।
भोजन का जिव्हा और दाँतों की सहायता से चर्वण होकर अन्न छोटे-छोटे टुकड़ों में विभक्त हो जाता हैं। बोधक कफ के द्वारा आहार श्लक्ष्ण, मृदु एवं क्लिन्न हो जाता है। इसी कफ के कारण आहार मधुरता को प्राप्त होता है। प्राण वायु की सहायता से आहार अन्ननलिका में होता हुआ आमाशय में पहुँचता है। यहाँ क्लेदक कफ जो आमाशय को पाचक पित्त के तीक्ष्ण और उष्ण गुणों से सुरक्षित रखता है, के द्वारा अन्न का क्लेदन होता हैे। आमाशय में अन्न का पीडऩ एवं मन्थन भी होता हैं फिर आहार सूक्ष्म भागों में विभक्त हो जाता है और पचने योग्य हो जाता है।
12.3.2 अम्ल अवस्था पाक (Amla Avastha Pak)
आहार आमाशय से आगे की ओर बढ़ते हुए और पाकावस्था को प्राप्त होकर विदग्ध हो जाता है। इससे उसकी प्रतिक्रिया अम्ल रस में परिवर्तित हो जाती है। इस अम्ल रस के कारण पित्त की वृद्धि हो जाती है।
अम्ल अवस्था पाक गृहणी में होता है। गृहणी में ही पित्तधरा कला होती है। आहार में गृहणी में पित्त आकर मिलता हैं। इस पित्त के प्रभाव के कारण भोज्य द्रव्य पक्व हो जाते हैं।
पित्त या अग्नि गृहणी के आश्रय में रहते हैं। अन्न पान का पूर्ण एवं विशेष पाक इसी क्षेत्र में होने के कारण यह मुख्य पित्त अधिष्ठान एवं अग्नि अधिष्ठान माना गया हैं। यहीं से ही पाचक पित्त एवं अग्नि अन्य पित्त स्थानों एवं अग्नियों का पोषण करती है।
इस प्रदेश में स्थित समान वायु अग्नि का संधुक्षण करती है तथा भोजन का पाचन, सार और मल का विभाजन होता है।
12.3.3 कटु अवस्था पाक (Katu Avastha Pak)
आहार को वायु द्वारा आगे बढ़ाया जाता है। वही आहार पक्वाशय में पहुँचता है तो वहाँ अग्नि के द्वारा शोषित होने के लिए पिण्ड के रूप में हो जाता है। वह कटु रस में परिवर्तित हो जाता है। इससे वायु की वृद्धि होती है।
गृहणी के उत्तर भाग में सार किट्ट विभाजन होकर वह नि:सार मलरूप द्रव्य उण्डूक में आता हैं। वहाँ पर पुरीषधरा कला द्वारा अन्नद्रवांश का शोषण होता हैं। शेष पिण्डित रूप में जो मल शेष रह जाता है वह पुरीष के रूप में मल द्वार से अपान वायु द्वारा बाहर फेंक दिया जाता है। मल रूप आप्य द्रव्य जो पुरीषधरा कला द्वारा शोषित होता है वह मूत्र का पूरण करता है।
इस प्रकार यह सम्पूर्ण प्रक्रिया ग्रहण किये गये खाद्य पदार्थ से लेकर स्थूल पाक होते हुए मलमूत्र आदि बनने तक होती है। अवस्था पाक में वर्णित मधुराम्ल कटु पाक के उत्पाद ही आगे चलकर निष्ठापाक या सूक्ष्म पाक की प्रक्रिया को सम्पूर्ण करते हैं।
12.4 निष्ठापाक या सूक्ष्म पाक (विपाक (Vipak) )
जठराग्नि द्वारा आहार का स्थूल पाक होने के पश्चात् उस आहार पर धात्वग्नि एवं भूताग्नियों द्वारा सम्यक् पाचन की क्रिया होती है, तब सूक्ष्म पाक होता है। धात्वग्नि एवं भूताग्नि के द्वारा पाचन न होने तक वह आहार शरीर के लिए विजातीय पदार्थ बना रहता हैे। पाचनोपरान्त उसका उपयोग धातुओं के वर्धन और पोषण के लिए शरीर में होता है।
भेद:- निष्ठापाक के सम्बन्ध में दो मत है –
1. आत्रेय सम्प्रदाय मत
2. धन्वतरी सम्प्रदाय मत
12.4.1 आत्रेय सम्प्रदाय मत
इस मत के मानने वालों को रस विपाक वादी अथवा त्रिविध विपाक वादी कहते हैं। इस मत के अनुसार अवस्था पाक की समाप्ति पर आहार के सार एवं मल के पृथक्करण के समय शरीर में अवशोशित आहार रस में कुछ विशेष रस उत्पन्न हो जाते हैं इस क्रिया का नाम निष्ठापाक या विपाक है।
जाठरेणाऽग्निा योगाद्यदुदेति रसान्तरम्।
रसानां परिणामान्ते स विपाक: इति स्मृत:।। (अ.हृ.सू.9/20)
अर्थात् आहार रसों में जठराग्नि के द्वारा पाक क्रिया पूर्ण होने पर जो रसान्तर होकर अन्य रस की उत्पत्ति होती है, उसे विपाक कहते हैं।
आचार्य चरक ने विपाक के भेद करते हुए बताया है कि कटु, तिक्त और कषाय रसों का विपाक प्राय: कटु, अम्ल का अम्ल और मधुर और लवण रसों का मधुर विपाक होता है।
प्राय: से तात्पर्य है कि इनमें कुछ अपवाद भी होते है- यथा सोंठ और पीपल कटु रस युक्त है, परन्तु विपाक मधुर होता है। ब्रीही मधुर रस युक्त है, परन्तु विपाक में अम्ल है। हरीतकी कषाय और आँवला अम्ल रस युक्त है, परन्तु विपाक मधुर होता है।
12.4.2 धन्वन्तरी सम्प्रदाय
इस मत के अनुसार ‘विपाक’ शब्द का अर्थ है- भुक्त द्रव्यों का पाचन होना। महाभूतों की दृष्टि से विचार करें तो पृथ्वी और जल महाभूत गुरू है तथा आकाश, अग्नि और वायु महाभूत लघु हैं। जिन द्रव्यों में पृथ्वी और जल महाभूत की अधिकता होती है वे पचने में अधिक समय लेते हैं अत: उनका विपाक गुरू होता है। जिन द्रव्यों में आकाश, वायु और अग्नि महाभूत की अधिकता होती है, वे द्रव्य पचने में कम समय लेते हैं, अत: उनका विपाक लघु होता हैं।
इस सिद्धान्त के अनुसार गुरू विपाक का अर्थ है देर से पाक होना और लघु विपाक का अर्थ है शीध्र पाक होना। गुरू विपाक के लिए मधुर विपाक तथा लघु विपाक के लिए कटु विपाक इन गौण संज्ञाओं का व्यवहार किया जाता है।
आचार्य सुश्रुत के अनुसार दो ही प्रकार का विपाक है, मधुर और कटु। इनमें मधुर विपाक गुरू तथा कटु विपाक लघु होता हैं।
12.5 भूताग्नि पाक
मानव देह पंचभूतात्मक है। देह की क्रियाशीलता के उपादान दोष, धातु एवं मल भी पाँच भौतिक हैं अत: शरीर को जीवित बनाये रखने के लिए द्रव्यों की आवश्यकता होती हैं। पृथ्वी पर पाये जाने वाले सभी आहार औषध द्रव्य भी पाँच भौतिक होते हैं। इन द्रव्यों में जिस महाभूत की अधिकता होती है उसे उसी महाभूत के नाम से जाना जाता है। शरीर की चिकित्सा करते समय इन्हीं महाभूत की स्थिति को साम्यावस्था में रखा जाता हैं।
महाभूत की संख्या पाँच होती हैं। इन्हीं महाभूतों की पाँच भूताग्नियाँ होती हैं यथा पार्थिवाग्नि, आप्याग्नि, तेजसाग्नि, वायव्याग्नि एवं आकाशाग्नि। आहार रस पाँच भौतिक है, उसमें पार्थिव, आप्य, तैजस, वायवीय एवं आकाशीय अणु विद्यमान रहते है। मानव शरीर एवं उनमें स्थित विभिन्न अंग प्रत्य›. एवं धातु आदि भी पॉच भौतिक हैं और इनमें भी पार्थिवादि पाँचों के अणु विद्यमान रहते हैं। इसी कारण सामान्य के सिद्धान्तानुसार आहार का पार्थिवांश शरीर के पार्थिव द्रव्यों की क्षतिपूर्ति एवं पोषण करता है। आहार का आप्य अंश शरीर के आप्य द्रव्यों की और आहार का आकाशीय अंश शरीर के आकाशीय द्रव्यों की क्षतिपूर्ति एवं पोषण करता है। सामान्य के सिद्धान्तानुसार आहार द्रव्यों एवं शरीर द्रव्यों में बाह्य एवं आभ्यन्तर दोनों प्रकार से समानता होनी चाहिये। यदि समानता नहीं है तो उस स्थिति में आहार द्रव्यों से शरीर द्रव्यों की क्षतिपूर्ति एवं पोषण नहीं हो सकता। दोनों में समानता लाने का कार्य भूताग्नि पाक द्वारा होता है।
भूताग्नि अपने-अपने महाभूतों में रहती है। पामचभौतिक आहार द्रव्यों में पार्थिवांश में पार्थिवाग्नि, आप्यांश में आप्याग्नि, तैजसाश्ंा में तेजस् अग्नि, वायवीय अंश में वायव्याग्नि और आकाशीय अंश में आकाशाग्नि वि़द्यमान रहती हैे। पाँचभौतिक द्रव्यों में उपस्थित रहने पर ये भूताग्निया निश्क्रिय रहती हैं पाँचभौतिक आहार द्रव्यों पर जठराग्नि पाक के द्वारा आहार रस रूपी विपाक में रसों के परिवर्तन होने पर ही भूताग्नियों में सक्रियता आती है, और ये भूताग्निया आहार द्रव्यों के अपने-अपने अंशों का पाचन कर आहार द्रव्यों में विलक्षण गुणों को उत्पन्न करती हैं।
चक्रपाणि के अनुसार भूताग्नि पाक के पूर्व आहार द्रव्य शरीर के पाँच भौतिक द्रव्यों के गुणों में आभ्यन्तर एवं बाह्य रूप से समान नहीं थे। इस कारण आहार द्रव्यों में पार्थिवांश विद्यमान रहने पर भी वह सामान्य के सिद्धान्तानुसार शरीर के पार्थिव द्रव्यों की वृद्धि नहीं कर पाता हैं। भूताग्नि पाक के उपरान्त आहार रस के पार्थिवादि अंशों में शरीर में शरीर के पाँच भौतिक भावों के अनुरूप विलक्षण गुण उत्पन्न हो जाते है और वह बाह्य और आभ्यन्तर रूप से पार्थिवादि द्रव्यों के सदृश गुण वाले होने से उनकी वृद्धि एवं पोषण के लिए सहायक होते है। शरीर में आहार रस में विद्यमान पार्थिवादि अंशों का उपयोग विभिन्न धातुओं की उत्पत्ति एवं पोषण के लिए धात्वग्नियां करती हैं।
12.5.1 भूताग्नि पाक का स्थान
शास्त्रकारों ने भूताग्नि पाक के स्थान का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया है। पित्तधरा कला में आहार रस के शोषण के उपरान्त ही भूताग्नि की क्रिया प्रारम्भ हो जाती है।
पित्तधरा कला से शोषणोपरान्त आहार रस यकृत एवं हृदय में पहुँचता हैं। भूताग्नि का कार्य सर्व शरीर में होता हैं, तथापि पित्तधरा कला, यकृत और हृदय प्रारंभिक कार्य क्षेत्र माने जा सकते हैं।
निष्कर्ष रूप में यह कह सकते हैं कि आहार द्रव्यों पर जठराग्नि पाक से वे सूक्ष्म अणुओं में परिवर्तित हो जाते हैं। सूक्ष्म अणुओं में भौतिक एवं रासायनिक परिवर्तन होता है और पित्तधरा कला से शोषण योग्य हो जाते हैं। जठाराग्नि पाक के बाद भूताग्निपाक होता है। इससे आहार में स्थित पार्थिवादि महाभूतों के निजातीय गुणों में सजातीय गुणान्तराधान होकर शरीर के पाँच भौतिक गुणों के समान हो जाते है, अर्थात् भूताग्नि पाँच भौतिक विजातीय गुणों को सजातीय बनाने का कार्य करती हैं।
12.6 धात्वग्नि पाक
आहार के पाचन के लिए जैसे जठराग्नि है, वैसे ही आहार पाक के पश्चात् उत्पन्न आहार रस का उपयोग, प्रत्येक धातु अपनी पुष्टि कर सके, इसके लिए प्रत्येक धातु की अपनी-अपनी अग्नि होती हैं। इसे धात्वग्नि कहते हैं।
आहार द्रव्यों का जठराग्नि तथा भूताग्नियों द्वारा पाक होकर उत्पन्न सार अन्न रस कहलाता हैं। इसमें आहार द्रव्यों का स्वरूप परिवर्तन होकर शरीरोपयोगी रूप हो जाता हैं तथा पार्थिवादि महाभूतों के गुणों से युक्त हो जाता है। इस अन्न रस का पित्तधरा कला अर्थात क्षुद्रान्त्र भित्ति द्वारा अवशोषण हो जाता हैं।
इस अवशोषित अन्न रस पर धात्वग्नि की क्रिया होती हैं। अन्न रस में विभिन्न धातु के अंश मौजूद रहते हैं परन्तु उनका स्वरूप शरीर धातुओं से भिन्न होता हैं। अत: प्रत्येक धातु अपनी धात्वग्नि द्वारा इस अन्न रस से सजातिय अंश प्राप्त कर परिपक्वता को प्राप्त करती है।
12.6.1 धात्वग्नियों की संख्या
धात्वग्नियों की संख्या सात हैं, ये अपने-अपने स्रोतसों में रहती हैं। इन्हें धात्वग्नि पाक के सात स्तर भी कह सकते हैं। उत्तरवर्ती स्तरों में होने वाला धात्वग्नि व्यापार व्युत्क्रम से पूर्ववर्ती स्तरों में होने वाले धात्वग्नि व्यापार की श्रेष्ठता एवं पूर्णता आदि पर निर्भर करता हैं।
धात्वग्नि व्यापार के अन्तर्गत दो प्रकार के कार्य सम्पन्न होते हैं-
1. धातु का निर्माण एवं 2. धातु का पोषण।
धातु का पोषण का उद्देश्य कोशिका व्यापार में प्रयुक्त हाने वाली ऊर्जा के लिए ईधन उपलब्ध करना एवं व्यय हुई ऊर्जा की क्षतिपूर्ति करना हैं।
धातु निर्माण का उद्देश्य- धातु का बृंहण, जीर्णधातु की स्थानापूर्ति हेतु नव धातु का निर्माण करना है।
12.7 ग्रहणी एवं पित्तधरा कला का पाचन में योगदान (Role of Grahani & Pittadhara Kala in digestion)
पाचन में ग्रहणी एवं पित्तधरा कला का योगदानजानने से पहले ग्रहणी और पित्तधरा कला की क्रियात्मक रचना (Functional anatomy) समझनी होगी। तत्पश्चात ही हम इनके पाचन (Digestion) में योगदान को समझ सकेगे।
षष्ठी पित्तधरा; या चतुर्विधमन्नपानमामाशयात् प्रच्युतं पक्वाशयोपस्थितं धारयति।।(सु. शा. 4/18)
षष्ठीत्यादि। पित्तमत्रान्तरग्निसञ्ज्ञकम्।आमाशयात् प्रच्युतं कफाशयाद्भ्रष्टं, पक्वाशयोपस्थितं पक्वाशयगमनायोपस्थितं पित्तस्थानं सम्प्राप्तं, धारयति ‘पाकार्थं’ इति शेष:। तथा च सङ्ग्रह:-‘षष्ठी …………. पचति’ (अ.सं.शा.5/36) इति।(सु. शा. 4/18पर डल्हण)
छठे क्रम पर आने वाली कला पित्तधर कला है। यहॉ पित्त से अग्नि समझा जाता है अर्थात इसे अग्निधरा कला भी कह सकते है। आमाशय से प्रच्युत अर्थात छूटने पर भोजन को पक्वाशय के उपर स्थित पित्तधराकला पाचनार्थ धारण करती है।
वर्तमान संज्ञाओं के अनुसार छोटी आंत्र (Small Intestine) के जिस भाग में पाचक रस कार्य करते है, उस भाग की आंतरिक कला को पित्तधरा कला कह सकते है।
षष्ठी पित्तधर नाम पक्वामाशमध्यस्था। सा ह्यन्तरग्नेरधिष्ठानतयाऽऽमाशयात् पक्वाशयोन्मुखमन्नं बलेनविधार्य पित्ततेजस शोषयति पचति पक्वञ्च विमुञ्चति। दोषाधिष्ठिता तु दौर्बल्यादाममेवाततोऽसावन्नस्य ग्रहणात् पुनग्र्रहणीसंज्ञा। बलं च तस्या: पित्तमेवाग्न्यभिधानमत: साऽग्निस्तब्धोपबृंहितैकयोगक्षेमा शरीरं वर्तयति। (अ.स.शा.5/36)
षष्ठी पक्वामाशययोर्मध्ये स्थिता आमाशयात् पक्वाशयोन्मुखमन्नं बलेन विधाय्र्य पचति। पित्ततेजसा करणभूतेन। सैव वातादिदोषाधिष्ठानेन दौर्बल्यादाममेव विमुञ्चति यदेवाग्नेर्धारणं तदेव तस्या उपस्तम्भनम्। यदेवाग्नेरुपबृंहणं तदेवास्या उपबृहणमित्येकयोगक्षेमा।। (अ.स.शा.5/ 36परइन्दु)
छठी कला पित्तधर कला होती है। यह पक्वाशय के उपर स्थित होती है। आमाशय से पक्वाशय में जाने वाला आहार पहले पित्तधर कला द्वारा धारण किया होता है।पक्वाशय के उपरका अर्थ पच्यमानाशय लिया जा सकता है, जिसे वाग्भट ने ‘पक्व-आमाशयमध्यस्था’ कह कर स्पष्ट कर दिया है। यह पाचक पित्त का स्थान है।यहॉ पाचक पित्त का तेज आहार का पाचन करता है औरपित्त का तेजआहार का शोषण भी करता है।
अष्टांग संग्रहकार बलेनविधार्य पित्ततेजस शोषयति पचति लिख कर ग्रहणी के बलपुर्वक अन्न को रोक कर पाचन करने पर ध्यानाकृष्ट करते है। इस कार्य में पित्ततैज को कारणभूत बताने से पित्ततैज के विषय में अधिक जानने की जिज्ञासा उत्पन्न करते है। पित्त के तैज को जानने के लिए हमे तैज को जानना होगा। पंचमहाभूतों में से एक तैज महाभूत है। शरीर में जितने भी बायोट्रांसफोरमेशन एक्टीविटी है, उन सबका कारणभूत तैज महाभूत ही है।
अशितं खादितं पीतं लीढं कोष्ठगतं नृणाम्।
तज्जीर्यति यथाकालं शोषितं पित्ततेजसा। (सु. शा. 4/ 19)
एतमेवार्थं श्लोकेन दर्शयन्नाह- अशितमित्यादि। अश भोजने, खादृ भक्षणे, धेट् पा पाने, लिह आस्वादने। तदन्नमशितादिविशेषणाक्रान्तमन्नं जीर्यति। यथाकालं कालानतिक्रमेण तीक्ष्णमध्यमन्दाग्निषु मात्राद्रव्यगुरुलघूचितकालानतिक्रमेण। (सु. शा. 4/ 19 पर डल्हण)
अशित, खादित, पीत लीढ चार प्रकार के भोजन जब कोष्ठ में जाते है, तो इनके पाचन में लगने वाला समय इन आहारद्रव्यों के प्रकार, अग्निबल, मात्रा, गुरूता-लघुता आदि पर निर्भर करता है। इस पचे हुये आहार का शोषण (Absorption) उचित समय पर पित्त के तैज से होता है।
ग्रहणी कोष्ठस्थाग्न्यधिष्ठानभूता नाडीय यदुक्तम्- अग्न्यधिष्ठानमन्नस्य ग्रहणाद्ग्रहणी मता (च.चि.15/41)
अपक्वं धारयत्यन्नं पक्वं सृजति पाश्र्वत:। सा दुष्टा बहुशो भुक्तमाममेव विमुञ्चति इति(च.चि.15/41 पर चक्रपाणि)
ग्रहणी कोष्ठ में स्थित होती है, जो अग्नि का अधिष्ठान रखने वाली नाडी है। यह बिना पचे हुये अन्न को धारण करती है और उसको पचाती है। पचने पर उसे धीरे-धीरे पाश्र्व भाग से आगे भेजती जाती है।
चक्रपाणी यहॉ भोजनकी मात्रा पर जोर देते हुये स्पष्ट करते है कि क्षमता सेज्यादा खाने से ग्रहणी दुषित हो जाती है और दुष्ट ग्रहणी आम अन्न को भी आगे भेज देती है। आम अन्न के अवषेषित हो जाने से शरीर में रोग उत्पन्न हो जाते है।
12.7.1 ग्रहणी एवं पित्तधरा कला की क्रियात्मक रचना (Fuctional anatomy of Grahani & Pittadhara Kala)
अग्न्यधिष्ठानमन्नस्य ग्रहणाद्ग्रहणी मता।
नाभेरुपर्यह्यग्निबलेनोपष्टब्धोपबृंहिता।।
अपक्वं धारत्यन्नं पक्वं सृजति पाश्र्वत:।
दुर्बलाग्निबला दुष्टा त्वाममेवविमुञ्चति।। (च. चि. 15/56-57)
सम्प्रतिग्रहणीदोषस्यसुखप्रतिपत्त्यर्थंग्रहण्या: स्वरूपंप्राकृतंकर्मचाह-अग्न्यधिष्ठानमित्यादि।अग्न्यधिष्ठानम्अग्नेराश्रयइत्यर्थ:।ग्रहणीसञ्ज्ञानिमित्तमाह-अन्नस्येत्यादि।ग्रहणादितिधारणात्,नाभेरुपर्यन्नस्यधारणादित्यर्थ:।किंवानाभेरुपरि अग्नेरूध्र्वज्वलनेनबलेनोपस्तम्भिताउपबृंहिताचसतिअपक्वमन्नंधारयति,पक्वंचपाश्र्वत:सृजतीतिवामपाश्र्वत:सृजतिययत:ग्रहणीगुदौवामपाश्र्वाश्रयौ,तेनवामेपाश्र्वेपक्वंसृजतीतियुक्तम्।उपस्तम्भिताइतिअग्निनापित्तव्यापारकरणेनअनुकूलिता,उपबृंहितेतिअग्निनाबृंहणव्यापारकरणेनसशक्तीकृताय किंवा उपस्तम्भत्वेनउपबृंहिता, अत्रपक्षेउपस्तम्भसाधारण्यंग्रहण्याआह। ग्रहण्या:प्राकृतंकर्माभिधायवैकृतंकर्माह- दुर्बलेत्यादि।दुर्बलाग्निश्च अबलाचेति,किंवादुर्बलमग्निबलंयस्या:सादुर्बलाग्निबला।दुष्टाइतिदोषदुष्टा।आमंविमुञ्चतीतिअपक्वमेवान्नंविमुञ्चति।पूर्वरूपेपक्वमामं वा विमुञ्चतीत्यनेन विदग्धरूपमाममेवोक्तम्,इहत्वामंनियमेनविमुञ्चतीतिनविरोध:।। 56-57
ग्रहणी और पित्तधरा कला को समझने के लिए प्रत्यक्ष शारीरी से हम जान पाते है कि लघु आन्त्र (Small intestine) की म्युकस कला (mucus membrane) मे अनको सुक्ष्म उभार (folds) होते है जिन्हे इन्टेस्टाइनल विलाई(Villi) कहते है। इनकी उचाई लगभग 1 मी.मी. तथा व्यास 1 मी.मी.से भी कम होता है।प्रत्येक विलाई कोलुम्नर (columnar) कोशिकाओं से आवरित (Lined) होती है जिन्हे एन्टरोसाइटस (Enterocytes) कहते है। इन कोशिकाओं में रोम के समान (hair like) सुक्ष्माकुर पाये जाते है जिन्हे माइक्रोविलाई (Micro-villi) कहते है।
यह सारी रचना को समझने पर पित्तधरा का कार्य भी समझा जा सकता है, जिसका चिकित्सा में बहुत महत्व है। विलाई और माइक्रोविलाई न केवल क्षेत्रफल बढाती है, वरन भोजन को पृर्णत: पचने तक रोके रखती हैे। इसी लिए कार्यो के आधार पर यह भाग ग्रहणी से समानता दर्शता है।
12.7.2 सार और किट्ट का पृथक्करण (Separation of Sara and Kitta)
विवेचयति च दोषरसमूत्रपुरीषाणि; तत्रस्थमेव चात्मशक्त्या शेषाणां पित्तस्थानानां शरीरस्य चाग्निकर्मणाऽनुग्रहं करोति, तस्मिन् पित्ते पाचकोऽग्निरिति सञ्ज्ञा। (सु.सू.21/10)
विवेचयति च पृथक्करोति दोषरसमूत्रपुरीषाणि। अत्र केचित् ‘अन्नरसमूत्रपुरीषाणि’ इति पठन्ति, ‘वातमूत्रपुरीषाणि’ इत्यपरे। अनुग्रहं करोति उपकारं करोति। (सु.सू.21/10 पर डल्हण )
पचत्यन्नं विभजते सारकिट्टौ पृथक् तथा।।
तत्रस्थमेव पित्तानां शेषाणामप्यनुग्रहम्।
करोति बलदानेन पाचकं नाम तत्स्मृतम्।। (अ.ह.सू.12/12)
तच्चान्नं पचति। सारकिट्टौ पृथग् विभजते-विभागीकरोति। किट्टशब्दस्य लोकाश्रयत्वाल्लिङ्गस्येति पुंस्त्वम् तत्रस्थमेव-पक्वामाशयमध्यगमेव, शेषाणां-रञ्जकादीनां धातुस्थानां च, अनुग्रहं-उपकारं करोति। बलदानेन-सामथ्र्याधानेन, स्वस्थानस्थमेव तेषूपकुरुत इत्यर्थ:।(अ.ह.सू.12/12की टीका)
सारकित्तौ विभजति शेषाणि च पित्तस्थानानि तत्रस्थमेवानुगृöाति तत्पाचकमित्युच्यते।(अ.स.सू. 20/7)
पाचक पित्त द्वारा सार (pure or absorbable part) एवं किट्ट (excretory part or metabolic waste) का विभाजन किया जाता है। पाचक पित्त का वर्णन अध्यााय 5 में किया गया है।
समान वायु:
समान वायु के कार्यो में भी सार और किट्ट का विभाजन या विवेचन या पृथ्थकरण आता है।
विवेको रसमूत्रपुरीषाणां पृथक्करणं, समानस्य कर्म; (सु. सू. 15/4पर डल्हण)
सोऽन्नं पचति तज्जांश्च विशेषान्विविनक्तिहि। (सु.नि. 1/16)
विशेषान् रसदोषमूत्रपुरीषाणि। विविनक्ति पृथक् करोति।(सु.नि. 1/16पर डल्हण)
समान वायु का वर्णन अध्यााय 4 में किया गया है।
इस प्रकार समान वायु एवं पाचक पित्त दोनो ही सयुक्त रूप से सार और किट्ट का विभाजन या विवेचन या पृथ्थकरण का कार्य करते है।
12.7.3 सार भाग का अवशोषण (Absorption of Sara)
सार एवं किट्ट के विभाजनोपरान्त भोजन के सार भाग का अवशोषण अन्न रस (chyle) के रूप में हो जाता है और किट्ट भाग (undigested food) मूत्र और पुरीष् के रूप में निष्काषित कर दिये जाते है।
12.7.4 अवस्थापाक के दोरान वात, पित्त एवं कफ की उत्पत्ति (Genesis of Vata-Pitta-Kapha during Aharapaka process)
मधुर, अम्ल और कटु अवस्था पाक के दोरान कफ, पित्त एवं वात की क्रमश: उत्पत्ति होती है। आहार और दोषो के सम्बन्ध में हमने देखा था कि भोजन के उपरान्त कफ की वृद्धि होती है, भोजन के पाक के दोरान पित्त की वृद्धि होती है और भोजन पाक के उपरान्त वात की वृद्धि होती है।इस दोषवृद्धि कामूल कारण अवस्था पाक के दोरान होने वाली दोषो की उत्पत्ति ही है।
दोषो के उत्पत्ति के मुख्य हेतु के रूप में षड रसों में महाभूतो की प्रधानता को देख सकते है।
मधुर अवस्था पाक में मधुर रस की उत्पत्ति होती है और इस मधुर रस मे प्रधान रूप से उपस्थित पृथ्वी और जल महाभूत कफ की उत्पत्ति करने वाले होते है।
अम्ल अवस्था पाक में अम्ल रस की उत्पत्ति होती है और इस अम्ल रस मे प्रधान रूप से उपस्थित अग्नि और जल महाभूत पित्त की उत्पत्ति करने वाले होते है।
कटु अवस्था पाक में कटु रस की उत्पत्ति होती है और इस कटु रस मे प्रधान रूप से उपस्थित वायु और महाभूत कफ की उत्पत्ति करने वाले होते है।
12.8 कोष्ठ (Kostha)
व्युत्पत्ति:-
कोष्ठ शब्द ‘कुश दाहे धातु से बना है। जिसका तात्पर्य जिसमें दाह या परिपाक की क्रिया हो उसे कोष्ठ कहते है।
अग्निचातुर्विध्यमुक्त्वा तदाश्रयस्य
कोष्ठस्य चातुर्विध्यं विवक्षुराह ….
कोष्ठ: क्रुरो मृदुर्मध्यो मध्य: स्यात्तै: समैरपि।(अ.ह. सू.1/8)
तैर्वातादिभि:, यथाक्रमं क्रुरमृदुमध्यलक्षण: कोष्ठो भवति। वातोत्कर्षेण क्रुर:। पित्तोत्कर्षेण मृदु:। कफोत्कर्षेण मध्य:। समै: पुनरेतैर्हान्युत्कर्षवर्जितैर्मध्य एव कोष्ठ:। क्रुरादीनां तु लक्षणं वमनविरेचनविधौ (सू.अ.18/34) वक्ष्यति। ननु समैर्वातादिभि: कथं मध्यकोष्ठता स्यादिति। ब्रुम:। समानां वातादीनां मध्ये द्वयोर्वातपित्तयो: स्वं स्वंक्रुरकोष्ठत्वमृदुकोष्ठत्वलक्षणाख्यं च विरुद्धं कर्म युगपत्कर्तुं न घटते। तृतीयस्तु सम एव कफ:। सोऽनयोर्मध्ये मध्यमां वृत्तिमाश्रित्य स्थितो नैकेनापि सह विरुध्यते। अत एव तत्कार्यं मध्यकोष्ठतालक्षणं ते वातपित्ते निषेद्धुं नैव घटेते। एवं च तेनावश्यमात्मीयं मध्यकोष्ठतालक्षणं कर्म कर्तव्यम्, यतो वातकर्मण: क्रुरकोष्ठतालक्षणस्य पित्तकर्मणो मृदुकोष्ठतालक्षणस्य च विरुद्धत्वात्। अतो मध्यकोष्ठतैव समैर्वातादिभिन्र्याय्या। इत्यांस्तु विशेष:। पूर्वो यो मध्यकोष्ठ: सोऽवश्यं प्रमाणाधिकेन कफेन जन्यते। मध्य: स्यात्तै: समैरपीति समग्रहणलिङ्गात्। इतरस्तु मध्यकोष्ठ: समदोषमध्यस्थितेन समेनैव स्वप्रमाणस्थितेन श्लेष्मणा भवतीत्यनया रीत्या हेतुभेदादन्यत्वम्। तथा मध्यकोष्ठयोर्लक्षणभेदोऽपि दृश्यते। यथा (च.सि.अ.1/8)- ‘श्लेष्माधिकश्छर्दयते ह्यदु:खं विरिच्यते मन्दकफस्तु सम्यक्ष् इति। तदयमत्रार्थ:। श्लेष्माधिके मध्यकोष्ठे न सम्यग् विरेचित्वं, समकफे तु मध्यकोष्ठे सुविरेचित्वमिति। (अ.ह. सू.1/8 परसर्वाङ्गसुन्दरी टीका)
कोष्टावस्थाविशेषाख्यं दोषकार्यमाह.कोष्ठ इतिद्य तत्र वातेन क्रूर: कोष्ठ: स्यात्ए पित्तेन मृदु:ए कफेन मध्य:ए त्रिभि: समैरपि मध्य:द्य अत्रापि पारिशेष्यं पूर्ववव्द्याख्येयम्द्य मध्यमेन शोधनेन हीनयोगी क्रूर:ए अतियोगी मृदु: सम्यग्योगी मध्य:द्य संसर्गसन्निपातजास्त्ववस्था: पूर्ववत्द्य योगवाहित्वं त्वत्र कफस्यद्य यदाह खारणादि:. ष्वातोल्बणा स्याद्ग्रहणी क्रूरकोष्टस्य देहिन:द्य पित्तला मृदुकोष्ठस्य योगवाही तयो: कफ:द्यद्यष् इतिद्य तेन वातकफाभ्यां क्रूर:, वातपित्ताभ्यां कफपित्ताभ्यां सन्निपाताच्च मृदु:द्य ननु “ष्बहुवातश्लेष्मभ्यां क्रूर:” इति सुश्रुतेन (चि.33) बहुकफस्य क्रूरत्वमुक्तम्ए इह तु मध्यत्वम्ए इति विरोध:द्यमैवम्ए सुश्रुतवाक्यस्य संसर्गपरत्वात् (अ.ह. सू.1/8 पर आयुर्वेदरसायनम् टीका)
12.8.1 कोष्ठ की रचना (Anatomy of Koshtha)
चरकानुसार:- आचार्य चरक के अनुसार महास्रोत शरीर मध्य, महानिम्न, आमाशय और पक्वाशय इन्हे कोष्ठ कहा है।
‘‘कोष्ठ: पुनरूच्यते महास्रोत: शरीर मध्यमहानिम्न आमपक्वाशयश्चेति।’’
(च. सू. 11/48)
तस्य हि कोष्ठग्रहणेनैव ग्रहणम्य अनेन न्यायेन यकृत्प्लीहाश्रितं च शोणितं कोष्ठत्वेनैवाभिप्रेतमिति बोद्धव्यं, समानन्यायत्वात्। (च. सू. 11/48पर चक्रपाणी)
सुश्रुतमतानुसार:- आठ अवयवो को मिलाकर अर्थात अन्ताधि (शरीर मध्य) को कोष्ठ की संज्ञा दी हैं।
‘‘स्थानान्यामाग्नि पक्वानां मूत्रस्य रूधिरस्य च।
हृदुण्डुक: फुफ्फुसश्च कोष्ठ इत्याभिधीयते’’ (सु. चि. 2/12)
उपरोक्त विवरण से शरीर के आकाश (रिक्त) स्थान कोष्ठ बताये गये है।
आधुनिक दृष्टि से शरीर में तीन प्रमुख रिक्त स्थान है, जिन्हे गुहाऐ (ष्ड्ड1द्बह्लद्बद्गह्य) कहते है।
1 वक्ष गुहा (Thoracic cavity)
2 उदर गुहा (Abdominal cavity)
3 श्रोणी गुहा (Pelvic cavity)
आधुनिक दृष्टि से इसे धड (Trunk) भी कहते है।
इसको कोष्ठ मानने पर चरक एवं सुश्रुत दोनो के मतो का समावेश हो जाता है और आधुनिक के अनुसार बताई गई तीनो गुहाओ (cavities) का ज्ञान भी हो जाता है।
12.8.2 महास्रोत
12.8.3 कोष्ठ के भेद और उनके लक्षण (Classification of Koshtha and the characteristics of each type of Koshtha)
प्राकृतिक रूप से प्रत्येक व्यक्ति की आंत्र की गति में भिन्नतायें होती है। एवं किसी आहार पदार्थ के प्रतिक्रियाये भी भिन्न भिन्न होती है। प्राचीन आचार्यों ने आंत्र की गति एवं प्रतिक्रियाओं के आधार पर कोष्ठ के तीन समुह बनाये है।
इन कोष्ठ के तीन प्रकारों को क्रूर कोष्ठ, मध्यम कोष्ठ एवं मृदु कोष्ठ कहा जाता है।
1. मृदुकोष्ठ
जिसकी ग्रहणी कला में पित्त – प्रबल, कफ – न्यून एवं वात – मंद रहती है ‘वह मृदु कोष्ठ’ व्यक्ति है। उसका सूखपूर्वक विरेचन होता है। दुग्ध पान से ही विरेचन हो जाता है।
विरेच्य द्रव्य – गुड, दूध, इक्षुरस, मस्तु, शर्करा, काश्मर्य, त्रिफला, द्राक्षारस।
2. क्रूर कोष्ठ
गुड, दूध, इक्षुरस, मस्तु, शर्करा, काश्मर्य, त्रिफला, द्राक्षारस से भी विरेचन नही हो, ऐसे प्रबल वात वाले व्यक्ति का कोष्ठ क्रूर होता है। कुटकी से विरेचन हो पाता है।
3. मध्यम कोष्ठ
जो क्रूर कोष्ठ एवं मृदु कोष्ठ के मध्य का हो। ऐसे व्यक्ति में निशोथ से विरेचन हो जाता है।
12.8.4 कोष्ठ के भेदौ का दोषो से सम्बन्ध (Relation between Koshtha and Dosha)
गुडमिक्षुरसं मस्तु क्षीरमुल्लोडितं दधि।
पायसं कृशरां सर्पि: काश्मर्यत्रिफलारसम्।
द्राक्षारसं पीलुरसं जलमुष्णमथापि वा।
मद्यं वा तरुणं पीत्वा मृदुकोष्ठो विरिच्यते।
विरेचयन्ति नैतानि क्रूरकोष्ठं कदाचन।
भवति क्रूरकोष्ठस्य ग्रहण्यत्युल्बणानिला।
उदीर्णपित्ताऽल्पकफा ग्रहणी मन्दमारुता।
मृदुकोष्ठस्य तस्मात् स सुविरेच्यो नर: स्मृत:। (च.स.ू 13/66-69)
मृदुकोष्ठादिलक्षणमाह- मृद्वित्यादि। अभ्यर्हितत्वात् कोष्ठज्ञानस्यान्यथाऽपि तल्लक्षणमाह- गुडमित्यादि। उल्लोडितं दधिसर:। कृशरा तिलतण्डुलमाषकृता यवागू:; वचनं हि- तिलतण्डुलमाषैस्तु कृशरा त्रिसरेति च।
क्रूरकोष्ठाविरेचनहेतुमाह- भवतीत्यादि। ग्रहणी कोष्ठस्थाग्न्यधिष्ठानभूता नाडीय यदुक्तम्- अग्न्यधिष्ठानमन्नस्य ग्रहणाद्ग्रहणी मता (च.चि.15) इति उदीर्णपित्तेत्यादि मृदुकोष्ठस्वरूपकथनम्।
क्रूरकोष्ठस्य ग्रहणीगतो वायुर्गुडादीनां सरत्वं प्रतिबध्नाति, मृदुकोष्ठस्य हि ग्रहण्यां विरोधको
वायुर्नास्ति, स्तम्भकोऽपि श्लेष्माऽल्प:, उद्भूतसरत्वगुणं च पित्तं प्रबलंय तेन गुडादिभि: सुखं विरेचनं भवतीति भाव:। (च.स.ू 13/66-69 पर चक्रपाणि)

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