Agni

Spread the love

अग्नि शब्द की व्युत्पत्ति –

  1. संस्कृत हिन्दी शब्द कोष में ‘‘अंगति ऊर्ध्वं गच्छति’’ अगि नि न लोपश्च । अग्नि शब्द की व्युत्पत्ति बतलाई गई है ।
  2. शब्दकल्पद्रुम के अनुसार अग्नि शब्द की व्युत्पत्ति ‘‘अगिगतौ’’ धातु से होती है । यद्वा ‘‘अ›ति ऊर्ध्वं गच्छति इति अग्नि’’ अर्थात् जिसका सदैव ऊर्ध्वगमन स्वभाव हो उसे अग्नि कहते हैं । (शब्दकल्पद्रुम पृ. 8)
  3. ‘‘अंगति ऊर्ध्वं गच्छति इति अग्निः’’ अगि, नि, न लोपः त्र अग्नि (वाचस्पत्यम् पृ. 48)। इसमें भी अग्नि को पुलि› ग्रहण किया है तथा इसका ऊर्ध्वगमन स्वभाव बतलाया है।
  4. अमरकोष में ‘‘अगि गतौ’’ धातु से अग्नि की व्युत्पत्ति बताई है । अ›ति – अगिगतौ (भ्वा. प. से) अंगेर्नलोपश्च (उ. 4/50) इति. निर्नलोपश्च । (अमरकोष पृ. 25/53 श्लोक)
  5. हलायुध कोष पृष्ट 107 पर – अग्नि – पुं. ‘‘अंगयन्ति अग्य्र जन्म प्रापयन्ति इति व्युत्पत्या हविः प्रक्षेपाधिकरणेषु ………………षड़ाग्निषु ।

यद्वा अंगति ऊर्ध्वं गच्छति इति । ’’अगिगतौ,

अंगेर्नलोपश्चेति नि नलोपश्च’’ तेजः पदार्थ विशेषः ।

उपर्युक्त व्युत्पत्तियों के आधार पर अग्नि के ऊर्ध्वगमनशील स्वभाव एवं सर्वव्यापकता का बोध होता है ।

अग्नि शब्द की निरुक्ति एवं परिभाषा –

अग्नि संस्कृत भाषा का शब्द है यह ‘‘व्यापक’’ अर्थ रखने वाले ‘अगि’ व्याप्तौ’ धातु से (अंगति व्याप्नोति इति अग्नि) या ‘अंग’ धातु से बना हुआ माना जाता है । इस दृष्टि से अग्नि का अर्थ हुआ व्याप्त रहने वाला पदार्थ या प्रगतिशीत वस्तु ।

‘‘अंगति ऊर्ध्वं गच्छति इति अग्निः’’ अर्थात् जो व्याप्त रहते हुए भी ऊर्ध्वगामी स्वभाव वाली होती है उसे अग्नि कहा जाता है ।

क्रिया शारीर में अग्नि परिभाषा –

अग्नि, देहाग्नि या कायाग्नि का पूर्ण और स्पष्ट रूप ‘‘पित्तोष्मा’’ शब्द से प्रकट होता है। ‘पित्तोष्मा’ अर्थात् पित्त द्रव्य और ऊष्मा का समवेत रूप । देह जगत में इसी पित्तोष्मा को अग्नि कहा गया है ।

पित्तोष्मा या अग्नि का अर्थ होता है – सजीव देह में रासायनिक क्रियाओं के लिए उत्तरदायी आग्नेय प्रकृति के प्राणिज द्रव्य और इनकी क्रिया के लिए अपेक्षित ताप। ये जीवरसायन द्रव्य या प्राणिज अग्नि द्रव्य प्रायः सूक्ष्म हैं और पित्त के अन्तर्गत हैं –

‘अग्निरेव शरीरे पित्तान्तर्गतः शुभाशुभानि करोति ।’’                   (च.सू. 12/11)

‘पित्तान्तर्गत’ इति वचनेन शरीरे ज्वालादियुतवन्हिनिषेधेन पित्तोष्मरूपस्य वन्हेः सद्भावं दर्शयति । (च.सू. 12/11 की टीका में चक्रपाणिदत्त)

अग्नि के पर्याय –

वैश्वानर, सर्वपाक, तनूनपात, अमीवचातन,   दमूनस, शुचि, विश्वम्भर

अग्नि के प्रकार (Type of Agni)  –

अग्नि का शरीर के साथ सम्बन्ध गर्भ स्थापना के समय से हेी माना जाता है। इस विषय में आयुर्वेद की मान्यता है कि जिन पांच भौतिक देहवीजों के शुक्र शोणित के सम्मूर्च्छन या रासायनिक सम्मिश्रण से गर्भोत्पत्ति होती है उन्हीं के साथ साथ अग्नि तत्व भी देह में संक्रान्त होता है । इन वीजों में से शुक्र ‘‘सौम्य’’ और शोणित ‘आग्नेय’ है इसलिए गर्भ में सोम और अग्नि दोनों के सूक्ष्म अंश पहुंचते हैं। गर्भस्थापना हो चुकने के उपरान्त यही अग्नि देह वृद्धि में सहायक होता है। तत्पश्चात् देह धारक धातुओं का अर्थात् दोषों, धातुओं, मलों का पारस्परिक सन्निपात (परस्पर संघटन, विघटन) होते रहने के परिणाम स्वरूप, प्रतिक्षण अन्तरूष्मा या अग्नि द्रव्य का देह में आविर्भाव होता रहता है। ये नित्य नवीन उत्पन्न अग्नियां ही अपने अपने नियत क्षेत्रों में, दोषाग्नि कर्म (पाचन, रंजन आदि) धात्वाग्नि कर्म (धातुओं के स्वकीय अंश प्रसादांश-मलांश निर्माण) और मलाग्नि कर्म (मल पाचन-क्लेद शोषण आदि) सम्पन्न किया करतीं हैं। इस सन्दर्भ में अष्टांग संग्रहकार ने कहा है कि –

‘‘दोष-धातु-मल सन्निपात जनितोऽन्तरूष्मा यथा निर्दिष्ट अधिष्ठान कर्मा अग्निः इति।’’ (अ.सं.शा.अ. 6)

उपर्युक्त स्थापना से यह भी स्पष्ट है कि हमारा सजीव शरीर मूर्तरूप में,पांच महाभूतो से निष्पन्न होता है इसलिए इसमें पांचों महाभूतों की अग्नियां स्वभावतः प्रतिष्ठित हैं। शरीर क्रिया विज्ञान के क्षेत्र में आकर विचार करें तो यह देह जिन जिन दोषों, धातुओं और मलों का समवेत रूप है, उन सबमें भी अग्नि की स्वभावतः विद्यमानता है और उनकी इन अग्नियों की दोषाग्नि, धात्वाग्नि और मलाग्नि संज्ञा दी जाती है। अष्टांग हृदयकार ने आत्रेय मत को ही अपने शब्दों में निम्न प्रकार से प्रस्तुत किया है –

‘‘दोष धातु मलादीनां ऊष्मेत्यात्रेय शासनम्।’’ अ.हृ.शा. 3/49

दोषाग्नियों के विषय में विचार किया जाय तो ‘पित्तं आग्नेयम्’ के अनुसार पित्त में तो अग्नि की सत्ता स्वाभाविक होने से समझ में आती है, परन्तु वात और श्लेष्मा में अग्नि का अंश संभव नहीं जान पड़ता, परन्तु चक्रपाणि जैसे सूक्ष्मदर्शी शरीर क्रिया विज्ञानी का मत है कि पांच भौतिक द्रव्य होने के कारण वात और श्लेष्मा में भी अग्नि अवश्य है, चाहे वह अल्पांश या अव्यक्त रूप में हो। अग्नि वस्तुतः तीनों दोषों में विद्यमान होती है। (च.चि. 3/129 पर चक्रपाणि) धातुओं और मलों में तो अग्नि की विद्यमानता आयुर्वेद जगत में सर्व विदित है ही (च.चि. 15 चक्र.)। भूताग्नियों में दोषाग्नि, मलाग्नि, उपधात्वाग्नि आदि अवान्तर अग्नियों का अन्तर्भाव कर लिया जाता है।

विभिन्न आचार्यों ने शरीरान्तर्गत सैंकड़ों सहस्त्रों अग्नियों की सत्ता स्वीकार की है (अ.हृ. 3/60 अरुणदत्त) परन्तु क्रिया शारीर के क्षेत्र में मुख्य रूप से तीन या तेरह अग्नियों की पृथक्-पृथक् सत्ता को स्वीकार किया है । (च.चि. 15/38)

तीन अथवा त्रयोदशाग्नि:-

(1)          जाठराग्नि      –      1

(2)          भूताग्नि        –      5

(3)          धात्वाग्नि      –      7

यहां पर आयुर्वेद के विभिन्न ग्रन्थों को आधार मानते हुए अग्नि भेद वर्गीकरण को निम्न रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है –

तालिकाः  अग्नि के भेद

क्र.सं. अग्नि भेद
1. अधिष्ठानुसार –
चरकमतेन  1. जठराग्नि 2. भूताग्नि 3. धात्वाग्नि (च.चि. 15/38)
वाग्भट्टोक्त 1. दोषाग्नि 2. धात्वाग्नि 3. मलाग्नि (अ.हृ.शा. 3/49, च.चि. 3/130, (सु.सू. 15/36)
2.            कर्मानुसार (सुश्रुतमतेन) 1. पाचकाग्नि 2. रंजकाग्नि 3.  आलोचकाग्नि 4. साधकाग्नि 5. भ्राजकाग्नि (सु.सू. 21/2, 15/5)
3.            बलानुसार जठराग्नि भेद (प्राकृत, वैकृत) 1. समाग्नि 2. विषमाग्नि 3. मन्दाग्नि 4. तीक्ष्णाग्नि (च.वि. 6/12, सु.सू. 35/28)

 

This Post Has 6 Comments

  1. dr dheeraj

    sunder , bahut sunder
    agni ke baare me bahut achhi jankari hai

  2. Dr manoj vijay

    Valuable information about agni according ayurveda .thanks Dr pankaj

  3. Dr Manoj Adlakha

    Very informative

  4. Rajesh khadav

    🙏

  5. Prof. Madan Mohan Sharma

    बहुत सुंदर और बहुत अच्छा लेख प्रिय पंकज जैन

Leave a Reply