अनुसंधान से बन सकता है आयुर्वेद भी आधुनिक, जब भी रिसर्च अथवा अनुसंधान की बात आयुर्वेद के बारे मे की जाती है कुछ लोगो को ऐसा लगता हैं कि उनका प्राचीन ज्ञान उनसे लूट लिया जायेगा और कुछ व्यवसायिक लोगो द्वारा आम जनता को आयुर्वेद के नाम पर लूटा जायेगा।
पुराने अनुभवो से यह सही भी था कि अंग्रेजो ने हमारा ही ज्ञान हमे ही बेच दिया। क्योकि हमे हमारे प्राचीन ज्ञान की कद्र नही थी। विदेशी रेपर में लपेट कर आयी कोई भी स्वीकार्य थी।
परन्तु आज परिस्थितिया कुछ बदली है। आज हमारे ज्ञान के रक्षक जैसे टीकेडीएल (TKDL) प्रोजेक्ट और सीसीआरएएस (CCRAS) जैसी संस्थाऐ है, जो कि मुस्तेदी से प्राचीन ज्ञान का संरक्षण करने के साथ-साथ आयुष चिकित्सको के हितो के रक्षार्थ खडी है। यह तो तय है कि नवाचार किसी भी विषय को समृद्ध करते है, किन्तु सामान्यतः आयुर्वेद में नवाचार को “जातबाहर” कर दिया जाता था और कुछ “ज्ञानचोर” तुरन्त इन नवाचारो को हथिया लेते थे और तो और उसका श्रेय भी खुद ही ले लेते थे। परन्तु आज जनता भी जागरूक हो चुकी है, वो समझ जाती है, कि कोन असली है और कोन ज्ञान चोर है।
यह जागरूकता लाने में न केवल आयुष मंत्रालय वरन कई अन्य कई संस्थाए कार्य कर रही है, जिन्हे प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है ताकि नवाचार होते रहे।आयुर्वेद के चारो स्तम्भ को महत्वपूर्ण मानते हुऐ न केवल चिकित्सको को सम्मान मिले वरन परिचायक को भी सम्मान मिले और परिचायको के युगानुरूप ज्ञान में अभिवर्धन हेतु कार्यशालाऐ आयोजित की जाए। अतः संक्षिप्त में कह सकते है कि परिचायको का कोशल्यवर्धन किया जाना अत्यन्त आवश्यक है।
आयुर्वेद के तृतीय स्तम्भ औषध को भी संवर्धन एवं विकसित करना आवश्यक है। कच्चे माल की आपुर्ति एवं उपलब्धता बढ़ाना आवश्यक होने के साथ साथ कच्चे माल के मुल्य को भी नियंत्रित करना आवश्यक है। चाहे केसर हो या कस्तुरी या शिलाजीत या पारद या रस औषधों के लिए आवश्यक धातु। इन सब औषधीयों के मुल्य आसामान को छू रहे है। कई कानुन भी कच्चे माल के उपयोग में बाधक बने हुऐ है, अतः जिस प्रकार एलोपैथी को इन कानुनो से छूट प्रदान की गई है, वैसे ही आयुर्वेद को भी छूट प्रदान की जानी चाहीये। बस्ति यंत्र में नवाचार हो या मलहर की ट्यूब पेकिंग या चूर्ण की सिरप फॉर्म और शिरोधारा यंत्र में नवाचार यह सब स्वीकार्य होकर प्रोत्साहित किये जाने पर ही नवाचार बढेंगे। जरूरत पडे तो सबसिडी देकर ऐसी संस्थाओं प्रोत्साहित किया जाना चाहिऐ ताकि अन्य संस्थाए भी आगे आये। और अंत में चिकित्सा के चतृर्थ स्तम्भ रोगी को शिक्षित करके, सही जानकारी देकर न केवल लुटने से बचाया जा सकता वरन उसके शरीर को अन्दर से खोखला कर मृत्यु के कगार पर ले जाने वाली केमीकल्स से बनी औषधों के प्रभाव से बचाया जा सकता है। इसके लिए बच्चो को शिक्षण के प्रथम वर्ष से ही आहार, दोष, धातु, मल, ऋतुचर्या और दिनचर्या जैसे विषयों से परिचित करवाना चाहिए। रोगी को उसके पैथी विकल्प को चयन करने के अधिकारों के बारे में शिक्षित किया जाना चाहिए। ज्ञात हो कि भारत मे 6 पैथी समान रूप से कानुनन मान्यता प्राप्त है एलोपेथी आयुर्वेद योग युनानी सिद्ध एवं होमियोपैथी। अत: आयुर्वेद की प्रोपाइटरी या पेटेंट औषध को एलोपैथी के चिकित्सको द्वारा प्रयोग करने से हुऐ कानुन उलंघन के बारे में रोगी को शिक्षित किया जाना चाहिए। रोगी को cross pathy प्रेक्टिस या माल प्रेक्टिस के बारे मे जानकारी देनी चाहिये. प्रस्तुत लेख के सबन्ध मे आपके सुझाव आमंत्रित है।
