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समय पर पहुँचें आयुर्वेद चिकित्सक के पास: षड् क्रिया काल और सही चिकित्सा

Published on September 12, 2026 by Dr. Pankaj Jain

Published on September 12, 2026 by Dr. Pankaj Jain


आज के समय में स्वास्थ्य को लेकर समाज में एक आम प्रवृत्ति देखने को मिलती है—जब भी किसी व्यक्ति को शरीर में किसी रोग के प्रारंभिक लक्षण दिखाई देते हैं, तो वह सबसे पहले आधुनिक (एलोपैथिक) चिकित्सा का रुख करता है। यदि प्राथमिक दवा से आराम मिल गया तो ठीक, अन्यथा एक डॉक्टर से दूसरे विशेषज्ञ (स्पेशलिस्ट) और दूसरे से तीसरे विशेषज्ञ के पास भेजने का सिलसिला शुरू हो जाता है। इस अंतहीन भागदौड़ और जांचों के फेर में महीनों या वर्षों बीत जाते हैं। धीरे-धीरे रोग हल्का रहने के बजाय 'जीर्ण' (क्रोनिक) हो जाता है और असाध्यता की कगार पर पहुँच जाता है।
अंततः विशेषज्ञ हाथ खड़े कर यह कहकर रोगी को घर भेज देते हैं कि "इस बीमारी का कोई स्थायी इलाज नहीं है, बस जब तक जीवन है लक्षण दबाने की यह दवा खाते रहिए, थोड़ा आराम रहेगा।"
थक-हार कर आयुर्वेद की शरण
जब व्यक्ति पूरी तरह निराश हो जाता है, शरीर दवाओं के दुष्प्रभावों से जर्जर हो चुका होता है और जेब खाली हो जाती है, तब थक-हार कर वह आयुर्वेद चिकित्सक के पास पहुँचता है। इस अंतिम अवस्था में पहुँचा रोगी मानसिक रूप से टूटा हुआ और हताश होता है।
आयुर्वेद चिकित्सक जब रोग की उस बढ़ी हुई और बिगड़ी हुई अवस्था को देखता है, तो वह सबसे पहले रोगी के गिरे हुए हौसले को संभालता है। रोग को जड़ से उखाड़ने के लिए वह खान-पान और दिनचर्या में कड़े नियम व पथ्य (परहेज) लागू करता है।
परहेज को लेकर समाज में भ्रांति
अक्सर लोगों के बीच यह गलत धारणा बन जाती है कि "आयुर्वेद में बहुत अधिक परहेज कराया जाता है।" वास्तविकता यह नहीं है कि आयुर्वेद चिकित्सक जानबूझकर अधिक परहेज बताते हैं, बल्कि परहेज की कठोरता पूरी तरह इस बात पर निर्भर करती है कि रोगी किस अवस्था में चिकित्सक के पास पहुँचा है।
शुरुआती दौर में जो रोग सामान्य औषधियों और मामूली बदलावों से ठीक हो सकता था, उसे अंतिम और असाध्य अवस्था में ठीक करने के लिए कड़े परहेज (पथ्य पालन) की आवश्यकता पड़ती ही है। शरीर के भीतर वर्षों से जमा विषैले तत्वों (आम दोष) को बाहर निकालने और धातुओं को पुनर्जीवित करने के लिए खान-पान पर नियंत्रण अनिवार्य हो जाता है।
षड् क्रिया काल का सिद्धांत
आयुर्वेद में किसी भी रोग के उत्पन्न होने से लेकर उसके पूर्ण रूप से प्रकट और जटिल होने तक की 6 अवस्थाएँ बताई गई हैं, जिन्हें ‘षड् क्रिया काल’ (या षट् चिकित्सा काल) कहा जाता है:
* संचय: दोषों का अपने स्थान पर धीरे-धीरे जमा होना।
* प्रकोप: दोषों का उत्तेजित या उग्र होना।
* प्रसर: प्रकोपित दोषों का अपने स्थान से निकलकर पूरे शरीर में फैलना।
* स्थानसंश्रय: दोषों का किसी विशेष अंग या स्रोत में जाकर रुकना (जहाँ से रोग की पूर्व-अवस्था शुरू होती है)।
* व्यक्ति: रोग के स्पष्ट लक्षणों का पूरी तरह प्रकट होना।
* भेद: रोग का जीर्ण, जटिल और असाध्य रूप धारण कर लेना।
जैसे-जैसे रोग पहली अवस्था से छठी अवस्था की ओर बढ़ता है, उसकी चिकित्सा उतनी ही कठिन, समय साध्य और जटिल होती चली जाती है। यदि व्यक्ति प्रथम या द्वितीय अवस्था में ही आयुर्वेद की शरण ले ले, तो न तो रोग बढ़ता है और न ही किसी कड़े परहेज की जरूरत पड़ती है।
सही समय पर सही निर्णय
लाखों रुपये खर्च करने और रोग को असाध्य बना लेने के बाद भी एक आयुर्वेद चिकित्सक अपनी सूझ-बूझ, धैर्य और औषधियों से रोगी को पुनर्जीवन देने का प्रयास करता है और अक्सर उसे स्वस्थ भी कर देता है।
बुद्धिमानी इसी में है कि आयुर्वेद को केवल "अंतिम विकल्प" न समझा जाए। शरीर में रोग के शुरुआती संकेत मिलते ही समय पर योग्य आयुर्वेद चिकित्सक से परामर्श लें, ताकि रोग प्रारंभिक अवस्था में ही समाप्त हो सके और आपका समय, धन व स्वास्थ्य तीनों सुरक्षित रह सकें।

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