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विरेचनोपरान्त संसर्जन क्रम का वैज्ञानिक महत्व

Published on September 12, 2026 by Dr. Pankaj Jain

Published on September 12, 2026 by Dr. Pankaj Jain


आयुर्वेद में पंचकर्म चिकित्सा का उद्देश्य केवल शरीर से संचित दोषों को बाहर निकालना ही नहीं, बल्कि शोधन के पश्चात शरीर के धातुओं और अग्नि को पुनः प्राकृतिक सामर्थ्य प्रदान करना भी है। पंचकर्म के अंतर्गत 'विरेचन' एक अत्यंत प्रभावी शोधन कर्म है, जो मुख्य रूप से पित्त दोष तथा उससे संबद्ध विकारों के शमन हेतु किया जाता है। परंतु विरेचन की सफलता केवल वेगों के सम्यक निष्कासन पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उसके उपरांत अपनाए जाने वाले आहार-नियम यानी 'संसर्जन क्रम' पर सर्वाधिक निर्भर करती है।
संसर्जन क्रम की अनिवार्यता
विरेचन प्रक्रिया के दौरान अधोमार्ग (गुदा मार्ग) से प्रचुर मात्रा में पित्त, कफ तथा आमाशय व पक्वाशय के मल का निष्कासन होता है। इस गहन शोधन के कारण शरीर की जठराग्नि अत्यंत मंद पड़ जाती है।
आयुर्वेदीय सिद्धांतों के अनुसार, मनुष्य के शरीर का मूल आधार त्रिदोष—वात, पित्त और कफ हैं, जिन्हें शरीर के ' त्रिस्तम्भ' के समान माना गया है। विरेचन के तुरंत बाद शरीर में वायु का प्रभाव बढ़ता है और जठराग्नि क्षीण हो जाती है। ऐसी संवेदनशील अवस्था में यदि व्यक्ति को सीधे भारी, गुरु या सामान्य आहार दे दिया जाए, तो कमजोर अग्नि उसे पचाने में पूरी तरह असमर्थ रहती है। इसका परिणाम यह होता है कि:
* प्रकुपित या चंचल हुई वायु पुनः अपनी सामान्य, संतुलित अवस्था में नहीं लौट पाती।
* शेष बचे दोष सम्यक रूप से संतुलित नहीं हो पाते, जिससे शोधन का पूर्ण लाभ नहीं मिलता।
* अग्निमांद्य के कारण अजीर्ण और 'आम' (विषैले अपच तत्व) का निर्माण हो जाता है, जो नए रोगों को जन्म दे सकता है।
अग्नि संवर्धन की क्रमिक प्रक्रिया
जिस प्रकार एक छोटी सी चिंगारी पर यदि एकाएक भारी लकड़ियाँ डाल दी जाएँ तो वह बुझ जाती है, परंतु यदि उसी चिंगारी पर पहले सूखा तिनका, फिर घास-फूस और अंत में धीरे-धीरे बड़ी लकड़ियाँ डाली जाएँ तो वह प्रचंड अग्नि का रूप धारण कर लेती है; ठीक उसी प्रकार विरेचन के बाद मंद हुई जठराग्नि को क्रमबद्ध आहार से प्रदीप्त किया जाता है।
संसर्जन क्रम में रोगी की शुद्धि के बल (प्रवर, मध्यम अथवा हीन शुद्धि) के अनुसार आहार की व्यवस्था की जाती है:
* पेया: अत्यंत हल्की, पतली चावल की मांड।
* विलेपी: थोड़ी गाढ़ी, सुपाच्य मांड।
* अकृत व कृत यूष: बिना छौंक और छौंक वाली मूँग की दाल का पानी।
* अकृत व कृत रस: शाकाहारी सूप व सामान्य सुपाच्य अन्न।
यह क्रमिक आहार व्यवस्था मंद अग्नि को धीरे-धीरे बल देती है, आंतों को पुनः पोषण अवशोषण के योग्य बनाती है तथा वात दोष का अनुलोमन कर उसे उसके प्राकृत मार्ग पर स्थापित करती है।
विरेचन कर्म के बाद संसर्जन क्रम का कड़ाई से पालन करना कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि संपूर्ण चिकित्सा का अनिवार्य आधार है। जब वायु अपनी प्राकृतिक साम्यावस्था में आती है और सभी शेष दोष संतुलित हो जाते हैं, तभी शरीर को विरेचन का दीर्घकालिक स्वास्थ्य लाभ और नवऊर्जा प्राप्त होती है।

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