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सप्तधातु

Published on September 12, 2026 by Dr. Pankaj Jain

Published on September 12, 2026 by Dr. Pankaj Jain


आयुर्वेद में शरीर को धारण और पोषण प्रदान करने वाले मूल तत्वों को 'सप्तधातु' कहा गया है। "धारणात् धातवः" अर्थात् जो शरीर के अंगों का पोषण करें, उसकी संरचना को बनाए रखें और जीवन का आधार बनें, वे धातुएं कहलाती हैं। भोजन के पाचन से बनने वाले 'आहार रस' से क्रमशः सातों धातुओं का निर्माण होता है।
1. रस धातु
शरीर में निरंतर संचरण (बहते रहने) का स्वभाव रखने वाली और सभी अंगों व ऊतकों का 'प्रीणन' (तर्पण एवं पोषण) करने वाली प्रथम धातु को रस धातु कहते हैं। यह हृदय और रक्तवाहिनियों के माध्यम से सम्पूर्ण शरीर में आवश्यक जल और पोषक तत्वों की आपूर्ति बनाए रखती है।
2. रक्त धातु
शरीर में 'जीवन' कर्म करने वाली तथा प्राकृतिक लाल वर्ण (Red colour) युक्त धातु को रक्त धातु कहा जाता है। यह रस धातु के रंजक पित्त द्वारा परिपक्व होने से बनती है। रक्त को शरीर में चेतना, प्राण और वर्ण की कांति का मुख्य आधार माना गया है।
3. मांस धातु
क्रमिक पोषण के अंतर्गत तरल स्वरूप से रूपांतरित होकर 'प्रथम घन (Solid) रूप' प्राप्त करने वाली धातु जो शरीर में 'लेपन' कर्म करती है, मांस धातु कहलाती है। यह अस्थियों और जोड़ों को आच्छादित (कवर) कर शरीर को उचित रूप, ढाँचा और बल प्रदान करती है।
4. मेद धातु
शरीर में स्निग्धता और वसा के रूप में स्थित होकर 'स्नेहन' कर्म करने वाली धातु को मेद धातु कहते हैं। इसका मुख्य कार्य शरीर में चिकनाई बनाए रखना, अंगों की सुरक्षा करना, स्वेद (पसीने) का निर्माण करना और ऊर्जा का संचय करना है।
5. अस्थि धातु
शरीर की सबसे कठोर, ठोस और स्थिर धातु जो 'धारण' कर्म करती है, अस्थि (हड्डी) धातु कहलाती है। यह शरीर को एक मजबूत कंकाल तंत्र (ढाँचा) प्रदान कर आंतरिक कोमल अंगों को सहारा और सुरक्षा देती है।
6. मज्जा धातु
अस्थियों के भीतर पाई जाने वाली खोखली गुहाओं में स्थित होकर 'पूरण' कर्म करने वाली स्निग्ध धातु को मज्जा धातु कहते हैं। इसका कार्य अस्थियों को भीतर से भरना, उन्हें बल देना और शरीर में स्निग्धता व पुष्टि बनाए रखना है।
7. शुक्र धातु
सप्तधातुओं के क्रमिक पोषण की अंतिम और सर्वोत्तम परिणति, जो 'गर्भोत्पादन' (प्रजनन) का कर्म करती है, शुक्र धातु कहलाती है। यह सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रहने वाली सूक्ष्म धातु है, जिसका मुख्य कार्य नई संतति की उत्पत्ति करना तथा शरीर को ओज, तेज और जीवन शक्ति प्रदान करना है।

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