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उपधातु की परिभाषा एवं ‘गतिविवर्जिताः’ का अर्थ

Published on September 12, 2026 by Dr. Pankaj Jain

Published on September 12, 2026 by Dr. Pankaj Jain


"सिरास्नायु रजः स्तन्यं त्वचो गतिविवर्जिताः।
धातुभ्यश्चोपजायन्ते तस्माद् उपधातवः॥"
* गतिविवर्जिताः का तात्पर्य: यहाँ 'गति' का अर्थ 'उत्तरोत्तर धातु-पोषण क्रम' (धातु-परिणाम परम्परा) से है। रस से रक्त, रक्त से मांस आदि क्रम में सातों धातुएँ एक-दूसरे को पोषण व रूपांतरण देती हैं (इन्हें अगति नहीं कहा जाता)। इसके विपरीत, जो अंश धातु से उत्पन्न होकर शरीर धारण या उपकार तो करता है, किंतु आगे किसी अन्य धातु का निर्माण नहीं करता (पोषण परम्परा रुक जाती है), उसे 'गतिविवर्जित' (अगति) कहते हैं।
प्रश्न: क्या कण्डरा एवं वसा की गति होती है? चक्रपाणि (या टीकाकार) यहाँ इनका नाम क्यों नहीं लेते?
1. कण्डरा व वसा की 'गति' नहीं होती (वे भी गतिविवर्जित हैं)
* आयुर्वेद सिद्धांत के अनुसार कण्डरा (रक्तज उपधातु) और वसा (मांसज उपधातु) भी उत्तरोत्तर किसी अग्रिम धातु का निर्माण नहीं करते।
* अतः स्वरूप व कर्म से कण्डरा और वसा भी पूर्णतः ‘गतिविवर्जित’ ही हैं।
2. इस श्लोक में कण्डरा एवं वसा का नाम छूटने का कारण (उपदर्शन मात्र / उपलक्षण)
* उपलक्षण नियम (Illustrative, not exhaustive): शास्त्रीय परिभाषाओं में जब किसी वर्ग के प्रमुख उदाहरण दिए जाते हैं, तो वह 'उपलक्षण' (Representative list) होता है, न कि परिगणन (Exhaustive)। यहाँ सिरा, स्नायु, रज, स्तन्य और त्वचा का उल्लेख उपधातु वर्ग का प्रतिनिधित्व कराने के लिए किया गया है।
* कण्डरा का स्नायु में अंतर्भाव: सुश्रुत संहिता (शारीरस्थान 5) के अनुसार कण्डरा को महती/स्थूल स्नायु ही माना गया है ("महत्यस्तु स्नायवः कण्डराः" अथवा महास्नायु)। अतः स्नायु शब्द के ग्रहण से कण्डरा का स्वतः बोध हो जाता है।
* वसा का मेद/उपधातु रूप में ग्रहण: वसा मांस की उपधातु (तथा शुद्ध मांस का स्नेह) है। उपधातुओं के सामान्य नियम धातु से पैदा होना परंतु आगे धातु न बनाना में वसा और कण्डरा समान रूप से समाहित हैं।
* रसात् स्तन्यं ततो रक्तमसृजः कण्डराः सिराः |
मांसाद्वसा त्वचः षट् च मेदसः स्नायुसम्भवः || चरक संहिता (चिकित्सा स्थान 15/17):
> (यहाँ चरक ने स्पष्ट रूप से कण्डरा को रक्त की तथा वसा को मांस की उपधातु परिगणित किया है।)
चक्रपाणि स्पष्ट करते हैं कि उपधातुएँ 'धातु' इसलिए नहीं कहलातीं क्योंकि वे शरीर के धातुओं की तरह अग्रेतर धातुओं का पोषण नहीं करतीं केवल शरीर का उपस्तम्भन/धारण करती हैं।
धातूनां पोषणमभिधायोपधातुपोषणमाह- रसात् स्तन्यमित्यादि| रसात् स्तन्यं प्रसादजं, तथा रक्तमपि रजःसञ्ज्ञं रसादेव प्रसादभागजन्यम्; उक्तं च सुश्रुते- “रसादेव स्त्रिया रक्तं रजःसञ्ज्ञं प्रवर्तते” (सु.सू.अ.१४) इति| एतच्च रजो रसजन्यमपि सूक्ष्मतया चिरेणैव जायते; यदुक्तं सुश्रुते- “एवं मासेन रसः शुक्रभवति, स्त्रीणां चार्तवम्” (सु.सू.अ.१४) इति| अस्रजः कण्डराः स्थूल स्नायवः, मेदसस्तु सूक्ष्मस्नायुपोषणं ‘मेदसः स्नायुसम्भवः’ इत्यनेन वक्तव्यम्| इह हि कण्डराशब्देन स्थूलस्नायुरुच्यते, सुश्रुते तु स्थूलसिरा| ते च स्तन्यादयो धात्वन्तरापोषणाच्छरीरपोषका अप्युपधातुशब्देनोच्यन्ते, रसादयस्तु शरीरधारकतया धात्वन्तरपोषकतया च धातुशब्देनोच्यन्ते; उक्तं च भोजे- “सिरास्नायुरजःस्तन्यत्वचो गतिविवर्जिताः| धातुभ्यश्चोपजायन्ते तस्मात्त उपधातवः” इति| अत्रापि हि ‘धातुभ्यश्चोपजायन्ते’ इत्यनेन जायन्त एव, परं न जनयन्तीत्युक्तम्| शुक्रं तु ओजोजनकत्वाद् धात्वन्तर्गतमेव| ओजस्तु इह न धातुषु नाप्युपधातुषु पठितं, तस्य सप्तधातुसाररूपतया सप्तधात्वन्तरगतत्वादेव, अत एव तस्याग्निरपि पृथङ्नोक्तः||चक्रपाणि दत्त टीका (चरक चि. 15/17)

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