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अध्याय 1      विषय प्रवेश   (Introduction)

Published on November 15, 2022 by Dr. Pankaj Jain

Published on November 15, 2022 by Dr. Pankaj Jain


अध्याय 1      विषय प्रवेश   (Introduction)

अध्याय विषय प्रवेश में हम जानेगे कि आयुर्वेद क्या है? शरीर क्या है? क्रिया क्या है? पुरूष क्या है? पुरूष के कितने भेद है? क्रिया शारीर का महत्व क्या है?
आयुर्वेदीय शरीर क्रिया विज्ञान/क्रिया शारीर (Physiology) आयुर्वेदाचार्य प्रथम वर्ष (BAMS Ist professional year) का एक आधारभूत विषय है। आयुर्वेद चिकित्सा के सिद्धान्तों को समझने के लिये ‘शरीरक्रिया’ विषय को समझना अत्यावश्यक माना जाता है।
आयुर्वेदीय शरीर क्रिया शब्द तीन शब्दों से मिल कर बना है - आयुर्वेद, शरीर एवं क्रिया।
इन तीनो शब्दो के अर्थ को जाना जाये, तो सम्पूर्ण शब्द ‘आयुर्वेदीय शरीरक्रिया’ के भावार्थ को समझा जा सकता है।
आयुर्वेद अर्थात आयु का वेद (detail knowledge of life)। जिसमें आयु का ज्ञान उपलब्ध हो। यहॉ वही स्वाभाविक प्रश्न उत्पन्न होता है, जो चरक सहिता के सूत्र स्थान के 30 वे अध्यााय में भी पूछा गया था, कि ‘‘किमायु?’’ अर्थात आयु क्या है? (What is Ayu?)

1.1 आयु की परिभाषा (Difinition of Ayu)

शरीरेन्द्रियसत्वात्मा सयोगो धारी जिवितम

नित्यगश्चानुबन्धश्च पर्यायेरायुरू च्यते (च. सू. 1/42)

शरीर, इन्द्रिय, सत्व एवं आत्मा के अनुबन्ध/संयोग को आयु (Life) कहते है। Combinition of Sharir, Indriya, Satva and Atma is called Ayu.

a. शरीर क्या है ? - पंचमहाभुतो का विकार एव आत्मा का भोगायतन है

b. इन्द्रिया क्या है ?- चक्षु, रसन, स्पर्शन आदि 5 ज्ञानेद्रिय और 5 कर्मेन्दिय

c. सत्व क्या है ? - मन के लिये कहा गया है।

d. आत्मा क्या है ? - ज्ञानप्रतिसन्धाता अर्थात ज्ञाता, दृष्टा।

इन सब के सम्यक संयोग को आयु कहते है। इस संयोग को 'चैतना अनुवृत्ति' भी कहते है। आचार्य चरक आगे कहते है कि चेतनानुवृत्ति, अनुबन्ध, जीवित और धारि एक ही अर्थ रखते है। अर्थात ये सब आयु के पर्यायवाची शब्द है।

तत्रायुश्चेतनानुवृत्ति र्जीवितमनुबन्धो धारि चेत्येकोऽर्थ: (च. सू. 30/22)

आयु/चेतनावृत्ति को जानने के बाद आयुर्वेद को जानने की जिज्ञासा उत्पन्न होती है।

1.2 आयुर्वेद की परिभाषा (Detail description of term ‘Sharir)

तदायुर्वेदयतीत्यायुर्वेद:; कथमिति चेत:? उच्यते- स्वलक्षणत: सुखासुखतो हिताहितत: प्रमाणाप्रमाणतश्चय यतश्चायुष्याण्यनायुष्याणि च द्रव्यगुणकर्माणि वेदयत्यतोऽप्यायुर्वेद:। तत्रायुष्याण्यनायुष्याणि च द्रव्यगुणकर्माणि केवलेनोपदेक्ष्यन्ते तन्त्रेण।। (च. सू. 30/23)

-जो आयु का ज्ञान करवाता हो।

-जो अपने लक्षणों द्वारा सुख-दु:ख, हित-अहित चार प्रकार की आयु प्रमाण व अप्रमाण द्वारा आयु का उपदेश करे अर्थात जिसमें इन चार प्रकार की आयु के लक्षण एवं प्रमाण बताये गये हो।

-जिसके द्वारा आयुष्य एवं अनायुष्य द्रव्यो, गुणों एवं कर्मो का ज्ञान हो।

विभिन्न आचार्यो द्वारा आयुर्वेद की निम्न परिभाषाये बतायी गयी है।

हिताहितं सुखं दु:खमायुस्तस्य हिताहितम्।

मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेद: स उच्यते ।। (च. सू. 1/41)

आयुरस्मिन् विद्यते, अनेन वाऽऽयुर्विन्दन्ति इत्यायुर्वेद:।।(सु. सू. 1/15)

अर्थात आयुर्वेद आयु का विज्ञान है (Ayurveda is a science of life) या शरीरेन्द्रियसत्वात्मा के अनुबन्ध अर्थात आयु (life) को बनाये रखने वाला चिकित्सा विज्ञान है।

1.3 शरीर शब्द की व्याख्या (Detail description of term ‘Sharir)

शरीरं पञ्चमहाभूतविकारात्मकमात्मनो भोगायतनम्।

आत्मा, मन और इन्द्रियों के आश्रय स्थल को शरीर (Body) कहते है। यह शरीर, गर्भाधान काल में अनेक भावों से युक्त पिता और माता के शुक्र-शोणित के संयोग होने पर निर्मित होता है। उत्पन्न हुआ गर्भ विभिन्न अवस्थाओं में क्रमश: परिवर्तित और परिवर्धित होता है। यही गर्भ सम्पूर्ण अंग प्रत्यंगों के विकास के पश्चात् शरीर संज्ञा धारण करता है। यही शरीर रस से लेकर शुक्र पर्यन्त सभी धातुओं, अनेक आशयों व शिरा-धमनी आदि का आधार बनकर प्राणों को धारण करता है। प्राण शरीर में आश्रित रहते हैं।

साधारणतय बोल चाल की भाषा में जीवित और मृत दोनों ही अवस्थाओं में इस पांचभौतिक समुदाय निर्मित पदार्थ को शरीर (Body) कहा जाता है और जीवित और मृत दोनों अवस्थाऐं चिकित्सा शास्त्र की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

मृत देह (Dead body) का शवच्छेदन करके रचनात्मक अध्ययन (Anatomical study) किया जाता है, तथा उसी के आधार पर जीवित प्राणी के शरीर के अंग-प्रत्यंगों का ज्ञान किया जाता है। इस अध्ययन को शरीर रचना (Anatomy) कहते है।

इसी प्रकार स्वस्थ जीवित शरीर (Living body) का क्रियात्मक अध्ययन (Functional study) किया जाता है, इस अध्ययन को शरीरक्रिया विज्ञान (Physiology) कहते है।

शरीर की चिकित्सा तब तक ही की जाती है, जब तक चेतना धातु शरीर के साथ रहती है। अत: चिकित्सा शास्त्र में, चिकित्सा की दृष्टि से, चेतन शरीर (Living body) का विशेष महत्व देखा जाता है।

1.3.1 शरीर शब्द की व्युत्पत्ति

विभिन्न मतों के अनुसार शरीर शब्द की व्युत्पत्ति निम्नानुसार हैं -

(1)       गर्भोपनिषद् के अनुसार:-

यह शरीर शब्द आश्रय अर्थात स्थिति अर्थ की ‘‘श्री’’ धातु से बना है। जिसका अर्थ है - ‘‘श्रयन्ते’’।

मानव देह को चेतनावस्था में शरीर इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसमें ज्ञानाग्नि, दर्शनाग्नि एवं कोष्ठाग्निं ये तीन प्रकार की अग्नियाँ निरन्तर गतिशील रहती है।

क) ज्ञानाग्नि - शरीर के सभी शुभ-अशुभ कर्म इसी अग्नि द्वारा होते है।

ख) दर्शनाग्नि - यह दर्शन का कार्य करती है। इसे ही आलोचक पित्त भी कहा जाता है।

ग)  कोष्ठाग्नि - शरीर में मुख द्वारा ग्रहण किए गए सभी प्रकार के अन्न का जो पाक करती है, उसे जठराग्नि या कोष्ठाग्नि कहते हैं।

(2)       शब्द रचना की दृष्टि से:- शब्द रचना की दृष्टि से हिंसा अर्थ वाली ‘शृ’ धातु से ‘‘इरन्’’ प्रत्यय करने पर शरीर शब्द बना है।

(3)      शरीर शब्द में उपशम अर्थात् विनाश अर्थ की ‘‘शम्’’ धातु भी मानी जाती है:-                     ‘‘शरीरं श्रृणाते शम्नातेर्वा।।’’

(4) पर्याय शब्दों के अनुसार:- शरीर शब्द के दो प्रसिद्ध पर्यायवाची शब्द हैं -‘देह’ और ‘काय’।

क) देह शब्द की उत्पत्ति ‘दिह’ धातु से ‘घञ्’ प्रत्यय करने से होती है। जिसका अर्थ है, वृद्धि या विकास होना।

ख) दूसरा शब्द काय है। यह शब्द अग्निवाचक है। सभी प्रकार के रासायनिक परिवर्तन अग्नि के द्वारा होते हैं, अत: इससे क्षय और वृद्धि दोनों क्रियाओं का ज्ञान होता है। इस काय शब्द की व्युत्पत्ति बताते हुए लिखा है कि -

‘‘चीयतेऽस्मिन् अस्थ्यादिकमिति काय:।    चि + घञ् आदे: ककार: ’’

अत: चयापचय की दोनों प्रक्रियाओं (Anabolic & Catabolic) का ज्ञान इस काय शब्द से परिलाक्षित होता है।

1.3.2 शरीर शब्द के पर्याय (Synonyms of term Sharir)

शरीर, देह, काय और पुरूष- ये चार शब्द समानार्थक हैं, और इनके सम्यक् ज्ञान से शरीर का पूर्ण ज्ञान होता है।

शरीर शब्द  ‘शीर्यते इति शरीरस्य’ इस व्युत्यत्ति से निर्मित है। श्ट धातु विनाश अर्थ में है, जिसमें ‘इरन्’ प्रत्यय लगकर शरीर शब्द निष्पन्न होता है। इससे शरीर वह द्रव्य है, जिसमें प्रतिक्षण नाश की क्रिया अथवा विघटन (Catabolic)  की क्रिया होती रहती है।

देह शब्द ‘दिह उपचये’ धातु से निर्मित है। दिह धातु में घञ् प्रत्यय लगकर देह शब्द निष्पन्न होता है, जिससे ज्ञात होता है, कि इसमें निरन्तर वृद्धि (Anabolic) की क्रिया भी होती रहती है।

काय शब्द ‘चिञ् चियने’ धातु से निर्मित है। चिञ् धातु का प्रयोग एकत्रित करने के अर्थ में है, जिससे अनेक देहपरमाणु अथवा कोश एकत्रित होकर समान कार्य के आधार पर ऊतकों का निर्माण करते हैं और विभिन्न ऊतकों से शरीर निर्मित होता है।

1.3.3 देह, शरीर एवं पुरूष तीनो शब्दों में सुक्ष्म विभेद (Micro difirence between term Deha, Sharir and Purush)

सामान्य बोलचाल में यह तीनो शब्द समानार्थी लगते है, किन्तु शास्त्रीय प्रयोग में इनमे सुक्ष्मान्तर प्रतित होता है।

पंचमहाभूत से बनी हुई धातुओं का सुव्यवस्थित पिंड ‘देह’ कहलाता है। ‘देह’ में अग्नि की उपस्थिति होने पर यह ‘शरीर’ नाम से जानी जाती है। शरीर में चेतन धातु अर्थात आत्मा के सयुक्त होने पर इसे ‘षडधात्वात्मक पुरूष’ के रूप में जाना जाता है।

देह = पंचमहाभूत

शरीर= देह + अग्नि

पुरूष = शरीर + आत्मा (चेतन)

पुरूष = देह + अग्नि + आत्मा (चेतन)

1.3.4 शरीर की परिभाषा (Definition of Sharir)

1)   शीर्यते इति शरीरम्

अर्थात् विभिन्न ग्रन्थियों की पाक क्रिया से तथा समायनुसार जिसका निरन्तर क्षरण होता रहे उसे शरीर कहते हैं। विभिन्न अग्नियों के द्वारा पाक होते रहने के कारण तथा कालस्वाभाव के कारण जिसका लगातार विनाश होता रहता है, उसे शरीर को कहते है।

2)   शीर्यते हिनस्ति आत्मानम् इति शरीरम्जो निरंतर गति करने के कारण अपने आपको नष्ट करता रहे, उसे शरीर कहते है।

3)   अथवा प्रत्येक क्षण क्षीण अवस्था को प्राप्त हो उसे शरीर कहा जाता है।

4)   शीर्ण होना, विश्रृंखल होना, विहातित होना आदि सभी अर्थ शरीर की उपचयात्मक प्रक्रियाओं (Catabolic Process) का ज्ञान कराने वाले हैं। इसी कारण इसका नाम शरीर है।

(5)   आधुनिक परिभाषा के अनुसार : आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की परिभाषानुसार  तीन माह तक की गर्भ अवस्था को भ्रूण/एम्ब्रिओ (Embryo) तथा इसके बाद की अवस्था को फीटस् (Foetus) कहा जाता है।  3 मास तक भ्रूणावस्था को गर्भ कहना चाहिए और चौथे महीने से उसको ‘शरीर’ कहना चाहिए।

(6)   शरीर क्रिया की दृष्टि से : शरीर अनेक प्रकार की क्रियाओं द्वारा निरन्तर गतिशील रहता है, अत: शरीर क्रिया दृष्टि से सप्त धातुऐं, त्रिदोष एवं तेरह अग्नियों के सम अवस्था में कार्यकारी समूह को ‘शरीर’ कहते है।

 (7) आयुर्वेदीय संहिता के ग्रन्थों के अनुसार:-

क)   चरक के अनुसार:-

तत्र शरीरं नाम चेतनाघिष्ठानभूतं पंचमहाभूत विकार समुदायात्मकं समयोवाहि।  (च.शा. ६/४)

समुदितस्यैव तावच्छरीरस्य स्वरूपमाह- तत्रेत्यादि। चेतनाशब्देन ज्ञानकारणमात्मोच्यते, भूतशब्द उपमानेय तेन, चेतनाया आत्मसम्बन्धिन्या: शरीरे एवोपलम्भादात्मन: शरीरमधिष्ठानमिति भवतिय परमार्थस्तु चेतना आत्माश्रया, आत्मा च निराश्रय एव; किंवा चेतनस्यात्मनोऽधिष्ठानभूतमिति चेतनाधिष्ठानभूतम्। पञ्चानां महाभूतानां विकारा रसादय: शरीरारम्भका:, तेषां समुदायो मेलक:, स आत्मा स्वरूपं यस्य तत्तथा।

समुदायशब्देन च समुदायारम्भका धातव एवोच्यन्तेय तेन, न संयोगमात्रस्य शरीरत्वप्रसक्ति:। किंवा, समुदाय: संयोग एवोच्यतां, तथाऽपि समुदाय आत्मा कारणं यस्य शरीरस्य द्रव्यरूपस्य तत् पञ्चमहाभूतविकारसमुदायात्मकं शरीरमेव। समेन उचितप्रमाणेन धातूनां मेलकेन सम्यङ्नीरोगतया वहतीति समयोगवाहि।(च. शा.6/4 चक्रपाणी व्याख्या)

चेतना अर्थात् आत्मा का आश्रयभूत और महापंचभूतों के समकिट (पुंज) रूप का नाम ही शरीर है। यह शरीर समयोगवाही होता है। अर्थात् तीन दोष, सप्त धातुऐं एवं मलों के समावस्था में रहने पर ही गति करता है।

अर्थात चेतना के अधिष्ठान को शरीर कहते है जो उचित प्रमाण में  पंचमहाभूतो के समुदाय से निर्मित हो।

ख)   सुश्रुत के अनुसार:-

शुक्रशोणितं गर्भाशयस्थमात्मप्रकृति विकारसंमूच्र्छितं गर्भ इति उच्यते।

शुक्र-शोणित का गर्भाशय में संयोग होने पर उसमें सूक्ष्म शरीर सहित आत्मा का प्रवेश होता है; उसे गर्भ कहते है।

गर्भ पर पंचमहाभूतों की क्रिया द्वारा उसका क्रमिक विकास होता है। इस प्रकार विकसित होते हुए जब हाथ, पैर आदि विभिन्न अंग-प्रयोग बनते हैं, उसी अवस्था में इसका नाम शरीर हो जाता है।

ग)   भावप्रकाश के अनुसार:-

गर्भाशय में एकत्र हुए शुक्र, रज और सोलह विकारों से प्रकृति आदि सभी गर्भ कहे जाते हैं। अवस्था पाकर बढ़ा हुआ गर्भ जब अंग और प्रत्यंगों से युक्त हो जाता है, तब उसे ही शरीर कहा जाता हैं।

चेतना का अधिष्ठान, पंचमहाभूतों के विकारों से उत्पन्न समुदायरूप समयोगवाही शरीर होता है। मानव शरीर की उत्पत्ति पृथ्वी, अप्, तेज, वायु एवं आकाश - इन पाँच महाभूतों के विकारों से होती है। इसमें चेतना का अधिष्ठान रहता है, जिससे यह शरीर जीवित कहलाता है। चेतना के न रहने पर यह शरीर मृत हो जाता है।

समयोगवाही का तात्पर्य इन्द्रिय-विषयक कर्म और काल का समयोग है। जिससे शरीर जीवन पर्यन्त स्वस्थ रहता है अथवा समयोगवाही का तात्पर्य है- पंचमहामूतों के विकारों से उत्पन्न दोष, धातु एवं मल का सम अवस्था में रहना, इनके विषम होने पर शरीर स्थिर नहीं रहता। इस कारण इनकी सम्यता अपेक्षित है। जब शरीर में धातुऐं विषम हो जाती है, तब शरीर रोग एवं क्लेश से ग्रसित होता है, अथवा मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।

1.4 क्रिया शब्द की परिभाषा (Definition of Kriya)

शाब्दिक व्युत्यत्ति की दृष्टि से यह शब्द कृ धातु में प्रत्यय लगाने से बना है, जिसका अर्थ है - कार्य करना, कार्य का होना ।
‘क्रियते एन् क्रिया ’

1.4.1 क्रिया शब्द के पर्याय (Synonyms of Kriya)

कर्म, कार्य, कर्मन्, Action, Actvity, Work

‘क्रियते इति कर्म’
अर्थात् क्रिया के अर्थ में ड् क्रिय क करणे धातु से कर्म शब्द की निष्पत्ति होती है। अत: जिससे क्रिया की सिद्धि होती हो, उसे कर्म कहते हैं।
‘यत् कुर्वन्ति तत् कर्म ’ (च.सू.26)
अर्थात् जो किया जाता है वह कर्म कहलता है।

1.4.2 कर्म (Action)

चिकित्सा शास्त्र में रोगी से रोग को समाप्त करने की अपेक्षा मे की गई क्रिया ‘कर्म’ कहलाती है।
इस प्रकार, बुद्धिमान चिकित्सक को कर्म (कार्य) से अच्छी तरह से परिचित होने पर चिकित्सा में सिद्धि मिलती है।

1.4.3 कर्म की परिभाषा (Definition of Karma)

वैशैषिक दर्शन कर्म को परिभाषित करता है .
एकद्रव्यमगुणं संयोगविभागेष्वनपेक्षकारणमिति कर्मलक्षणम्।(वे. सू.१/१/१७)
एक द्रव्य से संयोग औेर दुसरे द्रव्य से वियोग के अनपेक्ष कारण को कर्म कहते है।

Karma is movement initiated by effort Or usually, just stated as “action”. Action (Karma) is a causative factor of conjunction and disjunction.  It located in substance and performance of that to be done. It doesn’t require another factor.

प्रयत्नादि कर्म चेष्टितमुच्यते। (च.सू. 1/49)

क्रमागतं कर्म निर्दिशति- प्रयत्नादीत्यादि। प्रयतनं प्रयत्न: कर्मैवाद्यमात्मन:; यथा- ‘तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम्’ (पा.अ.1पा.1सू.9) इत्यत्र व्याख्यातम्। आदिशब्द: प्रकारवाची। तेन संस्कारगुरुत्वादिजन्यकृत्स्नक्रियावरोध:। यद्यपि चेष्टितं प्राणिव्यापार उच्यते, तथाऽपीह सामान्येन क्रिया विवक्षिता। चेष्टितपदेनैव सर्वकर्मलाभे सिद्धे वमनादिकर्मनिषेधे च सिद्धे प्रयत्नादीति पदं सुसूक्ष्मप्रयत्नरूपकर्मव्यापित्वद्योतनार्थम्।  अन्ये तु प्रयत्नादीति प्रयत्नकारणमिति ब्रुवते, प्रयत्नग्रहणं च कारणोपलक्षणं वदन्तिय तेन गुरुत्वादिकार्यस्यापि कर्मणो ग्रहणमिति। प्रयत्नशब्दश्चायुर्वेदेऽपि कर्मवचनो दृश्यतेय ‘प्रवृत्तिस्तु चेष्टा कार्यार्था, सैव क्रिया प्रयत्न: कार्यसमारम्भश्च’ (वि.अ.8) इति वचनात्। (च.सू. 1/49 पर चक्रपाणि)

प्रयत्न द्वारा की गई चेष्टा कर्म कहलाती है। कार्य समारम्भ, कार्य करने की चेष्टा / प्रवत्ति को क्रिया भी कह सकते है। यह कर्म संयोग और विभाग का कारण होता है। सयोग और विभाग को युगपत कारण कहा गया है, क्योकि यदि एक स्थान पर संयोग होता हैं, तो उसी समय दुसरे स्थान पर वियोग भी होता है।

संयोगे च विभागे च कारणं द्रव्यमाश्रितम्।

कर्तव्यस्य क्रिया कर्म, कर्म नान्यदपेक्षते।। (च.सू. 1/52)

कर्मलक्षणमाह- संयोग इत्यादि। संयोगे च विभागे च युगपत् कारणम्। तेन संयोगे उत्तरदेशसंयोगकारके विभागाकारणे, तथा विभागे च विभागजविभागमात्रकारणे संयोगाकारणे व्यावृत्ति: सिद्धा। द्रव्यमाश्रितमिति स्वरूपमात्रकथनं व्याख्येयं, द्रव्यव्यावृत्तिस्तु ‘कर्म नान्यदपेक्षते’ इत्यनेनैव सिद्धा। अस्यायमर्थो यत् - कर्म उत्पन्नं स्वाश्रयस्य द्रव्यस्य पूर्वदेशविभागे उत्तरदेशसंयोगे च कर्तव्ये नान्यत्कारणं पश्चात्कालभाव्यपेक्षतेय द्रव्यं तु यद्यपि संयोगविभागकारणं युगपद्भवति, तथाऽपि तदुत्पन्नं सद्यदा कर्मयुक्तं भवति तदैव संयोगविभागकारणं स्यात्य कर्म तूत्पन्नं करोत्येव परं संयोगविभागौ न तु कारणान्तरं पश्चाद्भाव्यपेक्षते, संयोगविभागाश्रयप्रत्यासत्तिं त्वपेक्षते, सा च पूर्वसिद्धैवेति न चरमभाविकारणान्तरापेक्षता, कर्मण:। अथ कर्मशब्देन वमनादीनां तथाऽदृष्टस्य तथा क्रियायाश्चाभिधीयमानत्वात् कस्य कर्मण इदं लक्षणमित्यत आह- कर्तव्यस्य क्रिया कर्मेति। एतेन क्रियारूपस्य कर्मण इदं लक्षणं नादृष्टादेरिति।। (च.सू. 1/52  पर चक्रपाणि)

स्पन्दन, गमन (walking), चेष्टा और वाक् प्रवृत्ति (speeking), मन प्रवृत्ति (thinking) एवं शरीर प्रवृत्ति आदि कर्म के प्रकार है।

‘‘स्पन्दन गमनादि चेष्टा प्रयत्न वाक्मन: शरीर प्रवृत्ति:।’’

अर्थात् शास्त्रों की दृष्टि से स्पन्दन, गमन, वमन, विरेचन एवं संयोग विभागादि अनेक प्रकार के भेद होते है।

1.5 शरीर क्रिया शब्द की व्युत्पत्ति

शरीरमधिकृत्य कृतं तंत्र शारीरम्। रचना प्रतिपादकं शारीरं रचनाशारीरम्, क्रिया प्रतिपादकं शारीरं क्रियाशारीरम्, मध्यपद लोपी समास:।

अर्थात् शरीर के विषय में अधिकृत शास्त्र को ‘शारीर’ कहा जाता है। इसके जिस भाग में रचना संबंधी विषयों का विवरण प्राप्त होता है, उसे रचनाशारीर (Ayurvedic anatomy) कहते हैं एवं क्रिया संबंधी विषयों का विवरण जिस शास्त्र से प्राप्त होता है, उसे क्रिया शारीर (Ayurvedic physiology) कहते हैं।

Ayurvedic physiology represent 'the study of all function in a living body under the aspact of Dosh, Dhatu & Mala.'

1.6 शारीर की परिभाषा (Definition of Ayurvedic Anatomy and Physiology)

 शरीरं चिन्त्यते सर्वं दैवमानुषसंपदा ।

            सर्वभावैर्यतस्तस्माच्छरीरं स्थानमुच्यते ।। (च. शा. 8/69)

            ‘‘शरीरिकभावमधिकृत्य कृतोऽध्याय: शारीर:।।’’

शरीर के सभी भाव जहॉ वर्णीत होते है उसे शारीर स्थान कहते है।

आयुर्वेद के संहिता ग्रन्थों में भी शारीर स्थान एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। किन्तु इन आयुर्वेद संहिता ग्रन्थों के शारीर स्थान के अतिरिक्त अन्य स्थानों में भी शरीर क्रिया से संबन्धित विषयों का बिखरा हुआ वर्णन मिलता है।

1.7 शारीर एवं शरीर मे भेद (Difference between term Shaarir and term Sharir) :

शारीर शब्द का अर्थ है वो शास्त्र जिसमें शरीर के विषय में ज्ञान प्राप्त किया जाता है। शारीर को ‘शरीर ज्ञान’ भी कह सकते है।

तालिका संख्या -1.1 शरीर एवं शारीर में अन्तर (Difference between term Shaarir and term Sharir)


















क्रम संख्या शरीर (Body) शारीर (Study of body)
1 दोष, धातु एवं मल से मिलकर बनता है। शरीर का अध्ययन
2 मुख्य रूप से इसकें 2 प्रकार होते है। लिंग या सुक्ष्म शरीर एवं स्थूल शरीर इसकें 2 भाग होते है - शरीर रचना एवं शरीर क्रिया

 

1.8 शरीर एवं शरीरी मे भेद (Difference between term Sharir and term Shariri) :

शरीर रूपी आश्रय में शरीरी आश्रयी के रूप में रहता है। शरीर अचेतन घटक है जबकि शरीरी चेतन एवं दृष्टा है। शरीरी युक्त शरीर की ही चिकित्सा  होती है।

तालिका संख्या -1.2 शरीर एवं शरीरी मे भेद




























क्रम संख्या शरीर (पंचमहाभूत विकार) शरीरी (आत्मा/चैतन)
1 ये पुरूष का एक अचेतन घटक है ये पुरूष का एक चैतन घटक है
2 ये आश्रय है ये आश्रयी है
3 आत्मा का सहयोग होने पर ही शरीर की चिकित्सा की जाती आत्मा की चिकित्सा नही होती है
4 दो भेद किये जा सकते है - मृत शरीर व जीवित शरीर दो भेद किये जा सकते है - आत्मा व परमात्मा

1.9 धातुभेद से पुरूष का संगठन (Description of the components of Purusha)

उत्पत्ति से लेकर मनुष्य के सांसारिक क्रियाकलाप, जीवनयापन काल एवं अंतिम अवस्था तक पुरूष का किसी न किसी रूप में शरीर के साथ साहचर्य अवश्य स्थापित किया है। अत: शरीर की बात हो और पुरूष की बात नही हो, ऐसा संभव नही है। शरीर क्षेत्र है, तो पुरूष क्षेत्रज्ञ। और जब क्षेत्र की चर्चा होती है तो क्षेत्रज्ञ/ पुरूष की चर्चा भी स्वाभाविक है।

Purush and Sharir are matter of discussion in Ayurveda texts and they both are equaly important and corealeted each other in respect of humen life (fertilization to till death).

‘‘पुरूषधारणाधातु: तेन धातुभेदेनेति पुरूषधारणर्थमेदेन।’’

महर्षियों ने शरीर रचना एवं क्रिया की दृष्टि से पुरूष का अस्तित्व अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है, जिसे धातुभेद से अथवा प्रकृति, आकृति, स्थिति एवं धातुज संगठन के आधार पर अनेक रूपों में जैसे - एकधातुज, षड्धातुज, एकादशधातुज, सप्तदशधातुज, चतुविंशतिधातुज एवं पंचविंशतिधातुज के साथ-साथ राशिपुरूष, कर्मपुरूष और चिकित्साधिकृत पुरूष के नाम से बताया गया है।

सजीव मानव शरीर के सभी भावों को दो वर्गो में विभक्त किया जा सकता है -

1 सूक्ष्म भाव - इसके अन्तर्गत जीवात्मा, मन एवं ज्ञानेन्द्रियों का समावेश होता है। इसे लिंग शरीर भी कहते है।

2 मूर्त भाव - दोष धातु मल से बना भौतिक शरीर जिसे आधुनिक बॉडी कहते है।

पुरू आत्मा यत्र शेते असौं पुरूष: इस व्युत्पत्ति से आत्मा जहाँ निवास करनी है, उसे पुरूष कहते हैं। इसी से न्यायदर्शन में ‘आत्मनो भोगायतनं शरीरम्।’’ यह शरीर की परिभाषा की गई है। अर्थात आत्मा जिसके द्वारा भोगोपभोग सामग्री का उपयोग करता है, वह शरीर है।

1.9.1 पुरूष शब्द की निरूक्ति एवं व्युत्पत्ति:

विभिन्न आचार्यों ने पुरूष शब्द की निरूक्ति बताते हुए अपने स्वतंत्र विचार इस प्रकार व्यक्त किये हैं:-

आचार्य चक्रपाणि लिखते हैं कि -

पुरि शरीरे शेते इति व्युत्पत्या य आत्मा पुरूषशब्देनोच्यते तमाह चेतनेत्यादि। (च.शा.1/16 पर चक्रपाणी)

इस पुरूष शब्द का निर्माण ‘‘पुर अग्रगमने’’ धातु से होता है, जिसका अर्थ गमन रूप क्रिया से लिया जाता है अर्थात् जिसका गमन देह-देहान्तर व लोक-लोकांतर में होता है, उसे पुरूष कहा जाता है।

यह गमन क्रिया पुरूष के चेतन धर्म से सम्पन्न होती है। अत: यह सिद्ध होता है कि गमन क्रिया जिस पदार्थ में पाई जाती है, उसमें किसी न किसी रूप में पुरूष की ही कारणता होती है।

पंचमहाभूतों एवं आत्मा के समुदाय शरीर के लिए भी आयुर्वेद में पुरूष शब्द का व्यवहार हुआ है, जैसा कि चरक के वचन से विदित होता है।

हिताहारोपयोगी एक एव पुरूष वृद्धिकरो भवति, अहिताहारयोग: पुनत्योधिनिमिन्त इति।

उपनिषदों में भी यही भाव स्पष्ट होता है:-

                        ‘‘सर्व एव पुरूषोऽन्नरसमय:।’’

अर्थात इस पुरूष का सर्व अन्नमय और रसमय है। अत: पुरूष को जानने के लिऐ उसके लक्षणों को जानना चाहिये।

1.9.2 पुरूष लक्षण:

पांचभौतिक सृष्टि में आत्म तत्व के सहयोग से विकास परम्परा का प्रसार होता है, यह आत्म तत्व ही चेतन तत्व है, इसी को पुरूष संज्ञा दी गई है। दर्शन तथा आयुर्वेद वाङ्मय में आत्मा के लिए बताए गए समस्त लक्षण, कर्म पुरूष के लक्षण व कर्मों की समानता प्रतीत होती है। अत: इन लक्षणों का सामान्य ज्ञान आवश्यक है।

(1)       चेतना धातुरत्येक स्मृत: पुरूषसंज्ञक:। 

(2)       खादयश्चेतनाषष्ठा धातव: पुरूष: स्मृत:।।

1.9.3 पुरूष का स्वरूप (Description of the Purusha) :

सामान्यतया पुरूष के दो भेद किये जा सकते हैं -
1 शुद्ध पुरूष (Suddh Purush)
2 औपाधिक पुरूष (Aupadik Purush)
1 शुद्ध पुरूष (Suddh Purush)
केवल चेतना धातु आत्मा रूप ही शुद्ध पुरूष कहा जाता है, जो क्षेत्रज्ञ के नाम से भी जाना जाता है।
2 औपाधिक पुरूष (Aupadik Purush)
आयुर्वेद में सुख-दु:ख के आश्रय को राशि पुरूष कहा जाता है। यह औपाधिक है, जिसमें कर्म पुरूष को इसका अधिकृत माना गया है।
इस प्रकार पुरूष का धातुभेद से विचार दो रूपों में किया जाता है-
(1) पुरूष विचय रूप से (2) शरीर विचय रूप से
(1) पुरूष विचय रूप से -
इसमें पुरूष विचय का धातुभेद से सूक्ष्म विवेचन है।
(2) शरीर विचय रूप से -
शरीर संख्या व्याकरण के प्रकरण में अंग-प्रत्यंगो का स्थूल से किया जाने वाला विवेचन शरीर विचय नाम से व्यवहृत है। इसे हम व्यवहार में शरीर का अंग-प्रत्यंग विवेचन (Anatomy) कह सकते हैं।

1.9.4 धातु विकल्प भेद से पुरूष भेद (Classification of Purusha)

अनेक विकल्पों सहित धातुभेद आयुर्वेद एवं दर्शन की दृष्टि से पुरूष के भेद करते हुए एकधातुज, द्विधातुज, त्रिधातुज, षड्धातुज, सप्तदशधातुज, त्रयोदशधातुज आदि अनेक रूपों में देखा गया है। एकधातुज पुरूष शुद्ध पुरूष है, एवं अन्य सभी की गणना राशि पुरूष में की जाती है। आयुर्वेद में स्थान-स्थान पर पुरूष का वर्णन षड्धातु रूप में किया गया प्रतीत होता है।

इसकी उत्पत्ति वेदांत और मीमांसा दर्शनों पर आधारित है, जिनमें अकेली चेतनाधातु आत्मा को ही पुरूष कहा जाता है। यही चैतन्य पुरूष कार्य-कारणों से संयुक्त होकर शरीर में भी चैतन्य प्रदान करता है। चेतना धातुरूप पुरूष आयुर्वेद का अधिकरण नहीं है।

यही सूक्ष्म शरीर धारण करके प्रत्येक जीव में रहने से जीवात्मा कहलाता है। इसी के अन्तरात्मा, इन्द्रियात्मा, भूतात्मा, संसारी आत्मा आदि अनेक नाम हैं। यह शुद्ध आत्मा निर्गुण होती है। किन्तु सत्त्वादि के संयोग से सगुण रूप धारण है। प्रकृति में सृष्टि उत्पत्ति की इच्छा उत्पन्न होने पर इसी के सम्पर्क से सृष्टि की रचना होती है।

अत: यह पुरूष न किसी से उत्पन्न होता है और न ही किसी को उत्पन्न करता है, किन्तु उत्पन्न होने वाले तत्वों में इसकी कारणता अवश्य विद्यमान रहती है।

चरक ने इसका वर्णन इस रूप में किया है:-

चेतनाधातुरप्येक: स्मृत: पुरूषसंज्ञक:।       (च. शा. 1/6)

            निर्विकार परस्त्वात्मा सत्त्वभूतगुणेन्द्रियै:।

            चैतन्ये कारण नित्यो द्रष्टा पश्यति हि क्रिया:।।     (च. शा. 1/6)

इस शुद्ध चेतना पुरूष को आयुर्वेद शास्त्र में सिद्धांतत: चिकित्सीय पुरूष नहीं माना जाता है। इसी बात को प्रकट करने के लिए ‘पुरूष संज्ञक’ बताया गया है। अत: चेतना धातु पुरूष नहीं है, केवल उसकी संज्ञा पुरूष रूप में दी गई है। सुश्रुत भी यही मानते हैं कि जो सर्वव्यापक एवं नित्य पुरूष है, उसका आयुर्वेद शास्त्र में उपदेश नहीं है, किन्तु अव्यापक क्षेत्रज्ञ पुरूष को ही कार्य करते समय अनित्य मान लिया जाता है।

  1. द्विधातु पुरूष (Dvidhtuj Purush)


विकल्प भेद से विचार करने पर क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ अथवा अग्नि-सोमीय भेद करते हुए पुरूष को द्विधातुज कहा जाता है।

(अ) क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ भेद से:-कर्म पुरूष के सम्पूर्ण घटक द्रव्यों का विभेद करने पर क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के दो रूप दृष्टि गोचर होते हैं। ये दोनों ही रूप शरीर को धारण करने में समर्थ हैं। इसमें जो क्षीण होता रहे अथवा क्षत से बचाता रहे ‘‘क्षतात किल त्रायते’’ वह क्षेत्र रूप शरीर है।

(ब)  अग्निसोमात्मक द्विविध स्वरूप:- सभी द्रव्यों में अग्नि एवं सोम की बहुलता होने के कारण पुरूष को भी अग्निसोमात्मक दो रूपों में प्रकट किया गया है। सुश्रुत ने गर्भवर्णन में शुक्र को सौम्य एवं आर्तव को आग्नेय बताया है, अत: गर्भ भी अग्निसोमात्मक होता है। यद्यपि आत्मा अग्निसोमात्मक नहीं है, फिर भी उसको उत्पन्न करने एवं उसके साथ तन्मय रहने से उसी के अनुरूप कार्यरूप में पुरूष का भी दो रूपों में परिगणन होता है।

अग्निसोमात्मकं सर्वं जगत् स्थावरजङ्गमम्।

                        अग्निसोमात्मका सर्वे देहिनस्तु चतुर्विधा:।।

यद्यपि सम्पूर्ण जगत अग्निसोमात्मक है, चतुर्विध प्राणी भी अग्निसोमात्मक ही है। इसी कारण देहधारियो में रहने वाले पुरूष को भी अग्निसोमात्मक द्विविध स्वरूप स्वीकार किया है।

  1. त्रिधातु पुरूष (Tridhatuj Purush):


पुन: विकल्प भेद से विचार करते हुए त्रिदण्ड रूप त्रिगुणात्मक एवं त्रिदोषात्मक तीन प्रकार के पुरूष का वर्णन किया है। पुरूष का यह विकल्प भेद भी धारण करने की दृष्टि से धातुरूपात्मक है।

(अ) त्रिदण्डात्मक:-शास्त्रों में सत्त्व ;मनद्धए आत्मा एवं शरीर मिलाकर त्रिदण्ड रूप पुरूष का भी उल्लेख आया है:-

            सत्त्वमात्मा शरीरं च त्रयमेतत् त्रिदण्डवत्।

                        लोकस्तिष्ठति संयोगात् तत्र सर्वं प्रतिष्ठितम्।।

अर्थात् इस लोक के आधार सत्त्व, आत्मा और शरीर हैं। इन्ही पर सब आश्रित है। यहाँ सत्त्व आत्मा एवं शरीर संख्या में तीन बताए गए हैं, अत: ये तीन होते हुए भी त्रय कहने का आशय यह है, ये तीनों मिलकर ही लोक शब्द से व्यवहृत होते है। यदि इनमें से एक के भी पृथक कर दिया जाए तो उसे लोक शब्द से नहीं पुकारा जा सकता।

लोक का अर्थ है ‘‘लोकते इति लोक:’’ जो ‘लोकृ दीप्तौ’ धातु से निष्पन्न होता है। अत: तीनों ही धारक एवं समूह रूप में चेतन शरीर का बोध कराने वाले है। इसी कारण धातु भेद से पुरूष को ‘त्रिदण्डात्मक’ कहा गया है।

(ब) त्रिगुणात्मक:-सत्त्व, रज और तम आदि तीन महागुण कहलाते है। मूल प्रकृति के विकार रूप सभी कार्य द्रव त्रिगुणमय होते हैं। निर्गुण पुरूष भी प्रकृति के विकारों के संसर्ग में आने से गुणयुक्त प्रतीत होने लगता है, अत: प्रकृति से संयुक्त पुरूष में सुख-दु:ख, मोह समन्वित होने से ही त्रिगुणात्मक स्वीकार किया जाता है।

(स) त्रिदोषात्मक:-अन्य पदार्थों के समान प्राणीमात्र के शरीर का निर्माण भी सूक्ष्म परमाणु घटकों से निर्मित होता है। ऐसा प्राचीन एवं नवीन दोनों मतों द्वारा मान्य है। आत्मा के संयोग से यह चेतन रूप धारण करता है, एवं पंचमहाभूत के विकार रूप सभी प्रकार की जीवनोपयोगी क्रियाऐं करने में समर्थ होता है। अत: इसे त्रिदोषमय कहा जाता है।

            वातपित्तष्लेष्मणा एव देहसम्भवहेतव:।  (सु.)

इस प्रकार तीनों दोषों से युक्त शरीर से संयुक्त होने के कारण जीवात्मा को भी त्रिदोषात्मक कहा जाता है।

  1. षड् धातुज पुरूष (Shadh Dhatuj Purush):


‘‘षड्धातव: समुदिता: ‘पुरूष’ इति शब्दं लभन्ते तद्यथा-

            पृथिव्यापस्तेजो वायुराकाशं ब्रह्म चाव्यक्तमिति।   (च. शा.5/4)

आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वि एवं आत्मा इन छ: धातुओं के समुदाय को पुरूष कहते हैं। यह षड्धातुज पुरूष न्याय एवं वैशेषिक दर्शनों की

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