- प्रकृति (Prakruti)
निरुक्ति:
‘‘वाचस्पत्यम्’’ के अनुसार प्रकृति शब्द ‘‘प्र’’ उपसर्गपूर्वक ‘‘डुकृञ’’ धातु से क्तिच् या क्तिन् प्रत्यय से निष्पन्न होता है।
व्युत्पत्ति:
‘‘प्रकृति’’ ‘‘प्र’’ शब्द प्रकृष्ट का वाचक है और ‘‘कृति’’ शब्द सृष्टि का। इस प्रकार सृष्टि में जो प्रकृष्ट देवी है वही प्रकृति है। प्रकृति में ‘‘प्र’’ शब्द सत्व गुण का बोधक है, ‘‘कृ’’ शब्द रजगुण का एवं ‘‘ति’’ शब्द तमस् का बोधक है।
प्रकृति के पर्याय (Synonyms of Prakuti):
संसिद्धि, प्रकृति, स्वरूप, स्वभाव, निसर्ग, कुदरत, तासीर, मिजाज, धर्म, गुण, माया, प्रधान, शक्ति, चैतन्य, Temprament, Constitution, Construction, Habit & Character भी है।
प्रकृति की परिभाषा (Definition of Prakuti):
आचार्य सुश्रुत के मतानुसार शुक्रशोणित संयोग काल में जिस दोष की उत्कट्ता होती है, उसी से व्यक्ति की प्रकृति उत्पन्न होती है। पुरुष के शुक्र और स्त्री के शोणित के संयोग से गर्भ उत्पन्न होता है। शुक्र और शोणित वात, पित्त, कफ अर्थात त्रिदोष युक्त होते हैं। इनमें दोषों की कुछ न्यूनाधिकता हो सकती है। जब इन दोनों का संयोग होता है, तब दोनों के भीतरी त्रिदोषों का भी संयोग होकर वात से वात, पित्त से पित्त एवं कफ से कफ मिलकर गर्भ का त्रिदोष बनता है। इस त्रिदोष में संयोगवश: तीनों की जब समता होगी तब सम प्रकृति बनेगी और गर्भ की वृद्धि तथा प्रकृति भी यथोचित और स्वस्थ रहेगी। परन्तु इस प्रकार समता होना बहुत कठिन है। प्राय: कोई न कोई दोष प्रबल हो जाता है और उसी के अनुसार वातल, पित्तल इत्यादि प्रकृतियां बन जाती है। जब दो दोषों की प्रबलता होती है, तब द्विदोषज प्रकृतियां बनती है।
शुक्रशोणितसंयोगे यो भवेद्दोष उत्कट:।
प्रकृतिर्जायते तेन तस्या मे लक्षणं शृणु ।। (सु. शा. 4/63)
सप्तविधत्वं प्रतिपा। तस्या उत्पत्तौ हेतुमाह- शुक्रेत्यादि। यो भवेद्दोष उत्कट इति स्वभावस्थितो न प्रकुपित:। द्विविधा ह्युत्कटा वातादय: प्राकृता वैकृताश्चय तत्र प्राकृता: सप्तविधाया: प्रक्रृतेर्हेतुभूता: शरीरैकजन्मान:, वैकृताश्च गर्भव्याघातका:। गयी त्वन्यथैवाशङ्क्य समादधातिय यथा- ‘ननु, स्वभावत: शुद्धं बीजं कर्मणा वा समधातुं गर्भं निष्पादयति, अनिलादिदोषदुष्टं तु गर्भजननाय न समर्थमिति शुक्रशोणितशुद्धावुक्तं, तत् कथमुत्कटेन दोषेण प्रकृतिरिति? उच्यते- न हि सर्वमेव बीजं दूषितं किं तर्हि बीजावयवो दूषित:, न चावयवगतदोषेण गर्भप्रतिबन्धो जात्यन्धमूकादेर्गर्भस्य दर्शनात्, तस्माद्य एवांशोबीजस्य दुष्टो भवति तत्कार्यस्यैव गर्भावयवस्य विकृतिरभावो वा भवतिय यथा- दृष्ट्यारम्भके बीजभागे दुष्टे जात्यन्धो गर्भो भवति न तु गर्भ एव न भवति, तथा दोषाख्ये बीजभागे दुष्टे तत्कार्यस्यैव गर्भशरीरभावस्य समधातोरपेक्षया विकृति: स्फुटितकरचरणादिलक्षणा भवति न तु गर्भव्याघात:। तदुक्तं- ‘शुद्धं स्वभावकर्मभ्यां वाताद्यैर्दुष्टमंशत:। दृष्टं बीजार्थकृद् बीजं तत्र प्रकृतिरुत्तरम्’- इति (सु. शा. 4/63 डल्हण)
देह प्रकृति के बारे में बताते हुए चरक संहिता में लिखा है कि गर्भावक्रान्ति के समय अलग-अलग दोषों से बनी प्रकृतियों से दोषों का अनुशय (जन्मकाल से शरीर में रहने से अनुकूलता) होने से देह प्रकृति कहते हैं।
तत्र प्रकृत्यादीन् भावाननुव्याख्यास्याम:। तद्यथा- शुक्रशोणितप्रकृतिं, कालगर्भाशयप्रकृतिं, आतुराहारविहारप्रकृतिं, महाभूतविकारप्रकृतिं च गर्भशरीरमपेक्षते। एतानि हि येन येन दोषेणाधिकेनैकेनानेकेन वा समनुबध्यन्ते, तेन तेन दोषेण गर्भोऽनुबध्यतेय तत: सा सा दोषप्रकृतिरुच्यते मनुष्याणां गर्भादिप्रवृत्ता। तस्माच्छ्लेष्मला: प्रकृत्या केचित्, पित्तला: केचित्, वातला: केचित्, संसृष्टा: केचित्, समधातव: केचिद्भवन्ति। तेषां हि लक्षणानि व्याख्यास्याम:।। (च. वि. 8/95)
प्रकृतिमिति स्वभावम्। एतानीति शुक्रादीनि। अत्र शुक्रे शोणिते वा यादृगवस्थो दोषस्तादृग्गर्भे प्रकृतिर्भवतिय तथा शुक्रशोणितमेलककाले ऋतुरूपे यो दोष उत्कटो भवति, स प्रकृतिमारभतेय एवं गर्भाशयस्थश्च दोष:; मातुराहारविहारौ तत्कालीनौ यद्दोषकरणस्वभावौ, सा च प्रकृतिर्गर्भशरीरे भवति। एषु च प्रकृत्यारम्भकेषु कारणेषु यद्बलवद्भवति कारणान्तरबृंहितं च, तदेव प्रकृत्यारम्भकं भवति। कालादयश्च शुक्रशोणितमेव कुर्वन्त: प्रकृतिजनका भवन्तीति तन्त्रान्तरे शुक्रशोणितगतदोषेणैव प्रकृत्युत्पादो दर्शित:। गर्भादिप्रवृत्तेति गर्भस्यादिमेलके प्रवृत्ता। अत्र च समैर्दोषैर्वृद्धैर्गर्भजन्मैव न भवतीति विकृतदोषत्रयप्रकृतेरनभिधानादिति ज्ञेयम्। प्रकृतिविकारश्च सूत्रस्थान एव व्याकृत:।। (च. वि. 8/95 पर चक्रपाणि)
शुक्रशोणित संयोग काल में जिस दोष की उत्कटता होती है, उसी के अनुसार प्राणियों में विभिन्नता होती है। भिन्न-भिन्न पुरुषों में भिन्न-भिन्न शारीरिक तथा मानसिक संगठनों के होने का कारण शुक्रशोणित संयोग काल में दोष उत्कटता ही है।
शरीर को प्रभावित करने वाले त्रिदोषो पर आधारित प्रकृति देह प्रकृति एवं मन को प्रभावित करने वाले त्रिगुणों पर आधारित प्रकृति मानस प्रकृति है।
रोगोत्पत्ति क्रम में जिस प्रकार के भी निदानों का सेवन किया जायें वे निदान रोग उत्पन्न करने से पूर्व दोष, अग्नि, स्त्रोत एवं दुष्य में विषमता उत्पन्न करते हैं । इस प्रकार रोगोत्पत्ति में प्रकृति अपना विशेष महत्त्व रखती है व रोगोत्पत्ति में दोषों की विषमता कारण होती है। इसी प्रकार दोषों की उत्कटता से प्रकृति सात प्रकार की होती है।
प्रकृति निर्माण (Genesis of Prakriti)
प्रकृति-निर्माणक भाव (Factors responsible for genesis of Prakriti) - प्रकृति निर्माणक भाव वो है जो परोक्ष-अपरोक्ष रूप से प्रकृति निर्माण में योगदान करते है यथा - ये भाव दो प्रकार के होते है:
1) गर्भकालज भाव (Intra-uterine factors)
2) जाति प्रसक्तादि भाव (Extra-uterine factors)
1) गर्भकालज भाव: - व्यक्ति की प्रकृति का निर्माण गर्भकाल में ही होता है। मनुष्य का जन्मजात स्वभाव प्रत्येक में भिन्न- भिन्न होता है, और उसके अनुसार ही प्रत्येक व्यक्ति की प्रकृति बनती है। स्वभाव को आदिबल प्रवृत्त (Hereditary) कहा है। मनुष्यों का मानसिक तथा शारीरिक स्वभाव, गुण, अवगुण आदि प्रकृति पर निर्भर करता है और स्वयं प्रकृति वात, पित्त, कफ एवं सत्व, रज और तम पर आश्रित है। गर्भाधान काल में शुक्रषोणित का जब संयोग होता है तो प्रत्येक पुरुष में अमुक-अमुक दोष की स्वभाविक अधिकता (दोषोत्कटता) के कारण मनुष्यों की भिन्न-भिन्न प्रकृतियों का निर्माण होता है। इस प्रकार दोषोत्कटता को प्रकृति निर्माण का मुख्य कारण माना जाता है।
प्रकृति पर प्रभाव डालने वाले गर्भकालज भाव निम्न है
- शुक्रशोणित प्रकृति 2. काल गर्भाशय प्रकृति
- मातुराहार-विहार प्रकृति 4. महाभूत विकार प्रकृति
ये भाव गर्भावक्रान्ति (fertilization) से ही प्रभाव डालना प्रारम्भ कर देते हैं। गर्भोत्पादक भावों की सम्पद् से शारीरिक एवं मानसिक प्रकृतियों का निर्माण होता है। अत: जो भाव देह प्रकृति निर्माणक है, उन्हीं भावों से मानस प्रकृति का भी निर्माण होता है। इन्ही चार प्रकारों में गर्भोत्पत्ति के षड़भावों का समावेष किया जा सकता है।
- शुक्रशोणित प्रकृति (Effect of Genotype of Sperm and ovam) :
आचार्य सुश्रुत ने शुक्रधराकला को सर्वशरीर व्यापिनी कहा है। शुक्र (पुरुष बीज) एवं आर्तव (स्त्री बीज) के संयोग से बनने वाले गर्भ शरीर के प्रत्येक अवयव में स्थित वंशानुगत एवं माता-पिता द्वारा अर्जित प्रकृति, उसके स्वरूप तथा क्रिया की विशेषता एवं उनकी रचना तथा क्रिया सम्बंधी विकृतियॉ भी संतान में आती है।
गर्भ निर्माण में मुख्य घटना शुक्र और शोणित का संयोग होना है, अत: शुक्र और शोणित में स्थित दोषाधिक्य गर्भ की प्रकृति का प्रधान कारण है। गर्भ की प्रकृति के उत्पादक भाव स्वभाव से शुक्रशोणित में ही उपस्थित रहते है। शुक्र में जिस प्रकार पिता के अंग-प्रत्यंग व अन्य भाव सूक्ष्म रूप में रहते है ठीक उसी प्रकार से आर्तव (स्त्री बीज) में माता के अंग-प्रत्यंग व अन्य भाव रहते है। अत: कई बालक मातृ-सदृश एवं कई पित्तृ सदृश होते है। अत: माता-पिता के गुण-वैगुण्य जो भी गर्भ में आते हैं उन्हें मातृज-पित्तृज भाव कहते है।
गर्भ में मातृजभाव - माता से प्राप्त होने वाले भावों को मातृजभाव कहते है। इसका प्रमुख तत्व शोणित को बताया है। आचार्य चरक ने बताया है कि गर्भ माता से उत्पन्न होता है। माता के बिना गर्भ की उत्पत्ति नही हो सकती।
गर्भ के उत्पन्न होते समय, माता से उत्पन्न होने वाले मातृज अवयव निम्नलिखित है - त्वचा, रक्त, मांस, मेद, नाभि, हृदय, क्लोम, यकृत, प्लीहा, वृक्क, बस्ति, पुरीषाधान, आमाशय, पक्वाशय आदि । आचार्य सुश्रुत ने मृदु अंगों को मातृत्व बताया है।
गर्भ में पित्तृजभाव - पिता से बनने वाले भावों को पित्तृज भाव कहते है। शुक्र इसका प्रमुख तत्व होता है, जिसमें पिता के समान समस्त अंगप्रत्यंग एवं गुणावगुण भाव सूक्ष्मरूप में उसी प्रकार उपस्थित रहते है जैसे सुक्ष्म बीज में विषाल वटवृक्ष समाहित रहता है।
गर्भोत्पत्ति के समय पिता से उत्पन्न होने वाले गर्भ के अवयव ये है - केश, श्मश्रु, नख, लोम, दन्त, अस्थि, सिरा, स्नायु, धमनी एवं शुक्र।
मनुष्य से मनुष्य की उत्पत्ति बतायी है, लेकिन यहॉं यह शंका उत्पन्न होती है कि मातृज-पित्तृज भावों में माता-पिता के समान जड़, अन्धा, बहरा बालक उत्पन्न होना चाहिए, किन्तु प्रत्यक्ष में ऐसा होता नही हैं। इसका कारण आचार्य चरक ने बताया है कि गर्भात्पादक बीज या बीज भाग में विकृति होने पर ही ऐसी सन्तान (अन्धें से अन्धा, लंगड़े से लंगड़ा) उत्पन्न होती है अन्यथा ऐसा नही होता। ऐसी सन्तान (अन्धें से अन्धा, लंगड़े से लंगड़ा) उत्पन्न होने का एक कारण दैव (पूर्वकृत कर्म) के अधीन बताया गया है।
गर्भ शरीर माता-पिता के सूक्ष्म अंगों से उत्पन्न होता है। अत: इन अंगों की धातुओं की पुष्टि माता-पिता के शुक्र-षोणित की पुष्टि पर निर्भर करती है।
अधिकांश पित्तृज भाव युक्त अंग एक्टोडर्म निर्मित तथा अधिकांश मातृज अंग एण्डोडर्म एवं मीसोडर्म निर्मित होते है।
- काल गर्भाशय प्रकृति (Effect of Kal) :
काल गर्भाशय प्रकृति से तीन प्रकार के काल लिये जा सकते है -
(क) संयोगकाल (sacramental intercourse time)
(ख) गर्भधारण काल (Effect of season)
(ग) माता-पिता की वय (Effect of parent's age)
(क) संयोगकाल (sacramental intercourse time)- शुक्र और शोणित मिलाने की चेष्टा को सम्भोग (sacramental intercourse) कहा जाता है। यह चेष्टा जिस समय की जाती है, वह सम्भोगकाल माना जाता है। इसके दो विभाग किये गये हैं -निंद्य और अनिंद्य।
निंद्यकाल - याज्ञवल्क्य-मासिक धर्म के प्रथम चार दिनों के अतिरिक्त अमावस्या, पूर्णमांसी, चतुर्दशी, अष्टमी, निंद्य मानते है। आचार्य मनु, सुश्रुत एवं वाग्भट्ट ने भी निंद्य कालों का वर्णन किया है। मासिक के प्रथम चार दिन, अगम्य तिथियों, सन्ध्याकाल, प्रभातकाल, अर्धरात्रि और मध्यान्हकाल को निंद्यकाल माना गया है।
अनिंद्यकाल - आचार्य सुश्रुत के अनुसार चौथी से बारहवी रात्रि में संभोग करने से आयुषमान, आरोग्य, सौंदर्य, ऐश्वर्य एवं बल से युक्त सन्तान उत्पन्न होती हैं।
गर्भोत्पत्ति में गर्भाशय का विशेष महव होता है, क्योंकि गर्भ का सम्पूर्ण विकास एवं पोषण गर्भाशय में ही होता है। अत: संभोग के आसन के अनुसार भी ग्राह्य और अग्राह्य दो प्रकार किये गये है।
अग्राह्य आसन - संभोग के समय में अधोमुखी अथवा करवट से लेटी हुई स्त्री से संभोग नही करना चाहिए, क्योंकि अधोमुखी स्त्री का वायु बलवान होता है, वह योनि को पीडि़त करता है। दक्षिण पाश्र्व लेटी हुई स्त्री के दक्षिण पाश्र्व में कफ होता है, जो अपने स्थान से च्यूत होकर गर्भाशय को आच्छादित करता है। वाम पाश्र्व लेटी हुई स्त्री के वामपाश्र्व में पित्त होता है जो कि प्रकुपित होकर आर्तव और शुक्र को विदग्ध करता है।
ग्राह्य आसन - उत्तान आसन को ग्राह्य आसन माना गया है। इस आसन में वातादि दोष अपने स्थान में रहते है, जिससे बीज ग्रहण करने में किसी प्रकार की परेशानी नही होती है।
इस प्रकार से संभोगकालीन आसनों और गर्भाशय में उपस्थित होने वाले दोषों का उत्पन्न होने वाले शिशु की प्रकृति पर प्रभाव पडता है। अत: गर्भाशय का स्वस्थ एवं दोषरहित होने के साथ-साथ ग्राह्य आसन एवं अनिंद्यकाल ज्ञान भी स्वस्थ सन्तानोत्पत्ति हेतु आवश्यक है।
(ख) गर्भधारण काल (Effect of season)-
वर्ष के दो भेद आदानकाल और विसर्गकाल किये गये हैं। इनमें तीन-तीन ऋतु होती है। इन ऋतुओं का शरीर पर परिणाम होकर स्वाभाविक रूप से वातादि दोषों की क्षय तथा वृद्धि होती है। जैसे ग्रीष्म ऋतु में वात का संचय होता है और वर्षा ऋतु में स्वाभाविक रूप से वात का प्रकोप होता है। अत: गर्भधारण के समय जो ऋतु होती है, उसका प्रभाव भी गर्भ की प्रकृति पर होता है।
(ग) माता-पिता की वय (Effect of parent's age) :
वयोऽहोरात्रिभुक्तानां तेऽन्तमध्यादिगा: क्रमात्।
बाल्यावस्था में कफ, युवावस्था में पित्त तथा वृद्धावथा में वात स्वाभाविक रूप से प्रधान होती है। जिसके परिणामस्वरूप सर्व शरीर पर होने वाले प्रभाव से शुक्रशोणित भी प्रभावित होते है। अत: माता-पिता की वय का प्रभाव निश्चित रूप से गर्भ की प्रकृति पर पड़ता है।
काल गर्भाशय प्रकृति का अर्थ टीकाकार गंगाधर इस प्रकार से करते हैं
‘‘मातु:कैशोर यौवन तारुण्य प्रौढय़ाद्यावस्थित काले गर्भाशयस्य व्या प्रकृति:।
- मातुराहार-विहार प्रकृति (Effect of parent's diet & habits) :
मातुराहार-विकार प्रकृति गर्भाधाने सतिमातु: यदाहारोऽभ्यवहरणं यथा-यथा च विहार स्तयोर्या प्रकृति: (टीकाकार गंगाधर)
आहार-विहार भी प्रकृति निर्माण में सहायक होते है अर्थात जिस प्रकार का आहार-विहार माता करेगी, उन्ही के गुणों के समान प्रकृति का निर्माण होगा।
सात्म्य वस्तु सेवन से उत्पन्न होते हुए गर्भ में जो भाव होते है, वे निम्नलिखित है-
आरोग्य, आलस्यरहित, अलोलूपता, इन्द्रियों की प्रसन्नता, स्वर, वर्ण एवं बीज का शुद्ध एवं गुणवत होना, सदा प्रत्येक कार्य में आनन्द की अधिकता का होना।
रसजभाव - गर्भ का पोषण माता की रस धातु से ही होता है। बिना रस के गर्भ की जीवन यात्रा सम्भव नही है। अनुचित रूप से सेवन किया गया आहार से बना रस सम्यक रूप से गर्भ का पोषण करने में समर्थ नही होता है।
गर्भ में निम्नलिखित रसजभाव होते है - शरीर को उत्पन्न करना, शरीर को बढ़ाना, शरीर से प्राण सम्बन्ध रखना (जीवित रखना), अंग-प्रत्यंगों को तृप्त करना, पुष्टि करना और उत्साह रखना है।
शुक्रशोणित में दम्पत्ति के आहार-विहार से उत्पन्न दोषों का अवस्थान होने से माता की ‘‘आहार-विहार’’ प्रकृति को प्रकृति का एक कारण माना जाता है।
परन्तु कई विद्वान माता के आहार-विहार का परिणाम ही नही अपित्तु पिता के आहार-विहार का भी प्रभाव शुक्र द्वारा गर्भ पर पड़ता है, ऐसा मानते है।
- महाभूतविकार प्रकृति (Effect of Fundamental Element) :
महाभूतविकार से भौतिकशरीर (body) अर्थ लेते है, जिसमें भूतात्मा के मिलने से चैतन्य उत्पन्न होता है। शुक्रशोणित के सयोंगोपरान्त गर्भ में धातुओं का निर्माण प्रारम्भ हो जाता है। गर्भ शरीर भी पाचभैतिक होता है और माता का आहार एवं उससे उत्पन्न होने वाला आहार रस भी पांचभौतिक होता है। आहार रस में जिन-जिन महाभूतों का प्रधान्य होता है उनसे धातुओं के उन-उन महाभूतों की न्यूनाधिकता होती है।
गर्भाधान में पुंबीज और स्त्री बीज में स्थित गर्भारम्भक पंचमहाभूतों में से किसी एक महाभूत की अधिकता से पार्थिव, आप्य, तेजस, वायव्य और नाभस ये पांच प्रकार की भौतिक प्रकृतियॉं होती है। उनमें से शरीर में वात वायु महाभूत का, पित्त तेजमहाभूत का और कफ जल महाभूत का प्रतीक होने से वातल, पित्तल और श्लेष्मल प्रकृति के अनुसार वायव्य, तेजस और आप्य प्रकृति का निर्माण होता है। पार्थिव प्रकृति वाला मनुष्य दृढ़ और बड़े शरीर वाला तथा क्षमाशील होता है। नाभस प्रकृति का मनुष्य शुचि (पवित्र आचरण वाला) दीर्घायु तथा मुख, नासिका, कर्णादि के बड़े छिद्रों वाला होता है।
अन्य गर्भकालज प्रकृति निर्माणक भाव
(अ.) आत्मजभाव :
अव्यक्त, अनादि इत्यादि नामों से कहा जाने वाला जीव गर्भाशय में प्रविष्ट होकर शुक्र शोणित से मिलकर अपने को स्वयं गर्भ रूप में उत्पन्न करता है। गर्भ में जो चेष्टाएं होती है अथवा उसका एक योनि से दूसरी योनि में गमन होता है। इसका कारण भी आत्मा है। इस प्रकार जायमान गर्भ आत्मा के अतिरिक्त किसी से भी उत्पन्न नही हो सकता। उत्पन्न होते हुए इस गर्भ आत्मा के आत्मज भाव निम्न है।
उस-उस विशिष्ट नाना योनियों में (मनुष्य, पशु, पक्षी आदि) में उत्पन्न होना, आयु (स्वल्पायु, उत्तमायु, मध्यमायु) आत्मज्ञान, मन, इन्द्रियां, प्राण और अपानवायु का प्रेरण, धारण, आकृति, स्वर एवं वर्ण की उत्पत्ति करना सुख, दु:ख, इच्छा, द्वेष, चेतना, घृति, बुद्धि, स्मृति, अहंकार, प्रयत्न। आत्मा निर्विकार होता है, इसलिए केवल आत्मजन्य ये भाव नही होते है किन्तु आत्म सन्निकर्षजन्य होते है। नानायोनिगमन जन्मपूर्व के आत्मज भाव है एवं आयु आत्मज्ञान आदि जन्मोत्तर आत्मजभाव होते हैं ।
मनुष्य की उत्पत्ति के साथ-साथ मानस प्रकृति निर्माण में भी ये भाव (आत्मज) सहायक होते हैं ।
(ब) सात्विक भावों का मानस-प्रकृति निर्माण में कारणत्व:
सत्व (मन) निश्चित रूप से औपपादुक (पूर्व जन्म) के शरीर से सम्बन्ध करने वाला है क्योंकि सत्व (मन) जीव का सदा स्पर्श करते हुए शरीर सम्बन्ध स्थापित करता है अर्थात् मन और आत्मा के नित्य सम्बन्ध से ही संसार चलता है। जब मन और जीवात्मा का सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है। तब आत्मा स्वतंत्र होकर मोक्ष को प्राप्त हो जाती है तथा संसार समाप्त हो जाता है। सत्व का निश्चित रूप से शरीरान्तर से भी सम्बन्ध होता है।
चरक संहिता में दयावृत्ति, संविभाग-रूचिता, क्षमा, सत्य, धर्म, आस्तिक्य, बुद्धि, ज्ञान-बुद्धि धारण करने की शक्ति, स्मृति धृति और अनासक्ति सात्विक गुण बतायें हैं।
राजस भाव (Rajas Bhava) -
गर्भ के निम्नलिखित भाव राजस भाव कहलाते हैं (ईर्ष्या या द्वेष)-बहुत बोलना, अहंकार, लोलूपता, दम्भ, मान, क्रोध, हर्ष एवं काम।
टीकाकार अरूणदत्त ने बहुभाषित्व, मान, क्रोध, दम्भ एवं मात्र्स्य की गणना करते हुए इनको उपलक्षण मात्र मानकर शौर्य, दुरुपचारता, लोलुपता, हर्ष एवं काम राजस भाव कहे हैं । दु:ख की बहुलता, भ्रमण की प्रवृत्ति, अधीरता, अहंकार, सत्य बोलने की प्रवृत्ति, क्रूरता, दंभ, मान, हर्ष, काम और क्रोध भी राजस् गुण माने जाते हैं ।
तामस भाव (Tamas Bhava) - अज्ञान, विशाद, प्रमाद, निद्रा, आलस्य, क्षुधा, तृष्णा, शोक, मात्सर्य, दूसरों के साथ विरोध एवं दूसरों में फूट डालना तथा सत्त्व के विपरीत आचरण करना। भय, अज्ञान, निद्रा, आलस्य एवं विषाद के अलावा प्रमाद एवं शोकादि को भी अरूणदत्त ने तामस् भाव माने हैं । विषादित्व, आस्तिक्य अधर्मशीलता, बुद्धि का निरोध, अज्ञान मूढ़ता, अकर्मशीलता, निद्रालुता तामस् गुण कहे हैं ।
- जाति प्रसक्तादि भाव (Effect of Breed etc.) :
प्रकृति निर्मापक अन्यभाव जो प्रकृति निर्माण में सहायक होते हैं उन्हें जाति प्रसक्तादि भाव कहा गया है।
जाति प्रसक्ता भाव (Effect of Breed etc.) - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि जातियों के शारीरिक एवं मानसिक, सबलता एवं निर्बलता की दृष्टि से आहार-विहार आदि विशिष्ट तवों का प्रभाव ।
कुल प्रसक्ता भाव (Effect of culture)- कुल की रीति विशिष्टता का प्रभाव । माता-पिता तथा उनके पूर्वजों के शारीरिक, मानसिक एवं उनके गुण अवगुण तथा विशिष्ट रोग एवं अन्य विशेषताओं का वंश में जो परम्परा का संचार होता है, उसे कुल प्रसक्ता भाव कहते है, जिससें कुल प्रसक्ता प्रकृति का निर्माण होता है।
देश प्रसक्ता भाव (Effect of locality) - मनुष्य की प्रकृति पर जिस देश में वह रहता है, वहॉं की जलवायु एवं आहार-विहार का प्रभाव प्रकृति पर पड़ता है क्योंकि विभिन्न देश की जलवायु में अन्तर होता है। जैसे - जाङगल प्रदेश (dry climete) के लोगों में वात-पित्त दोष बहुल होते हैं, आनुप प्रदेश (moist climete) के लोग वात-कफ दोष बहुल तथा साधारण प्रदेश के लोग समदोष वाले होते हैं।
काल प्रसक्ता भाव (Effect of enviroment) - ऋतु का प्रकृति के ऊपर विशिष्ट प्रभाव पड़ता है। आचार्य चक्रपाणि ने काल से कृतयुग, द्वापर युग तथा कलियुग आदि विशिष्ट काल को ग्रहण किया है। कृतयुगादि काल का प्रभाव प्रकृति आदि पर दिखाई पड़ता है।
वय प्रसक्ता भाव (Effect of age) - बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था का प्रभाव भी प्रकृति पर होता है यथा बाल्यावस्था में कफ का प्रकोप होने के कारण प्रकृति के समान शारीरिक कुछ लक्षण भी जैसे - त्वचा की स्निग्धता, निद्राधिक्यता, कोमलता आदि मिलते है।
प्रत्यात्म नियता भाव ( Effect of individuality )-
इसके अंतर्गत वैयक्तिकी विविधताओं, शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक, सामाजिक, बौद्धिक एवं व्यावसायिक व्यक्तिनिष्ठ भावों का ग्रहण किया जाता है। उक्त सभी भावों का समन्वय होकर व्यक्तिगत रूप में निर्मित हुई जो विषिष्ट प्रकृति है। उससे आहार-विहार, आचार-विचार, बुद्धि, मेधा, सात्म्य, बल अग्नि, कोष्ठ, इन्द्रिय, मन आदि व्यक्तिगत बनते हैं ।
त्रिदोषों के विषिष्ट गुणों के अनुसार सम्पूर्ण देह में, देह के अवयव और अणु में देह रचना, क्रिया में और मानसिक क्रिया में प्रभाव पड़ता है। उक्त समस्त भाव मिलकर ही देह एवं मानस प्रकृति निर्माण करते हैं ।
गर्भोत्पत्ति के षड़भावों का समावेष चार प्रकार की प्रकृतियों में किया जा सकता हैं-
- शुक्रशोणित प्रकृति - मातृज-पित्तृज भाव
- काल गर्भाशय प्रकृति -
- मातुराहार-विहार प्रकृति - सात्म्य और रसज भाव
- महाभूत विकार प्रकृति - सत्त्वज और आत्मज भाव
प्रकृति प्रकार (Types of Prakuti)
प्रकृतियां दो प्रकार की होती है
- देह प्रकृति
- मानस प्रकृति 1. देह प्रकृति के भेद (Types of Deha Prakuti) :
देह प्रकृति को दोषजप्रकृति भी कहा है। चरक ने देह प्रकृति का वर्णन करते हुए सूत्र स्थान में सात प्रकार की प्रकृति दोषानुसार बतायी है। यहॉ सम प्रकृति वाले व्यक्तियों कों स्वस्थ बताया गया है।
चरक विमान स्थान में भी सात प्रकार दोषाधिक्य से प्रकृति के 7 भेद बताये गये है।
- वातल प्रकृति 2. पित्तल प्रकृति
- श्लेष्मल प्रकृति 4. वात-पित्तल प्रकृति
- वात-श्लेष्मल प्रकृति 6. पित्त-श्लेष्मल प्रकृति
- समधातु प्रकृति
आचार्य सुश्रुत ने भी दोषानुसार उक्त सात भेद ही बताये है। अष्टांग संग्रह एवं अष्टांग हृदय में वाग्भट्ट ने एवं अन्य आचार्यों ने भेल संहिता, शारङगधर संहिता, भावप्रकाश भी उक्त सात ही भेद बताये है। हारित संहिता में दोषानुसार चार प्रकृतियों का वर्णन उपलब्ध होता है -
- वात प्रकृति 2. पित्त प्रकृति
- कफ प्रकृति 4. सन्निपात प्रकृति
काश्यप संहिता में सात भेदों के अलावा मुख्य रूप से तीन भेदं प्रकृति के बताये हैं-
- वातस्थूणा 2. पित्तस्थूणा 3. श्लेष्मस्थूणा
मानस प्रकृति के भेद:-
मन के अनुसार यह तीन प्रकार की बताई है।
चरकसंहिता में मानस प्रकृति के तीन भेद बताये गये हैं यथा -
- सात्त्विक प्रकृति
- राजसिक प्रकृति
- तामसिक प्रकृति
सात्त्विक के 7, राजस के 6 एवं तामस के 3, इस प्रकार कुल 16 उपभेद मानस प्रकृति के होते है।
सुश्रुत संहिता में भी 3 भेद बताये गये हैं यहॉं काय शब्द प्रकृति का बोधक है। इन तीनों के 16 उपभेद हैं ।
अष्टांग संग्रह - सात भेद बताये गये हैं।
- सात्त्विक प्रकृति 2. राजसिक प्रकृति 3. तामसिक प्रकृति 4. सत्वराजसिक प्रकृति 5. सत्वतामसिक प्रकृति 6. राजसतामसिक प्रकृति 7. समगुणप्रकृति
अष्टांग हृदय - मानस प्रकृतियों के भेदों का वर्णन प्राप्त नहीं होता है, सिर्फ सात्विक, राजसिक एवं तामसिक भावों का वर्णन उल्लिखित है। इन्ही गुणों के आधार पर सात्विकादि प्रकृति समझते है।
देह प्रकृति के भेदों के लक्षण (Characteristics of each kind of Deha-Prakriti)
वात प्रकृति के पुरूष के लक्षण (Characteristics of Vata-Prakriti)
तस्य रौक्ष्याद्वातला रूक्षापचिताल्पशरीरा: प्रततरूक्षक्षामसन्नसक्तजर्जरस्वरा जागरूकाश्च भवन्ति, लघुत्वात् लधुचपलगति चेष्टाहारव्याहारा:, चलत्वादनवस्थितसन्ध्यक्षिभ्रूहन्वोष्ठजिहृाशिर: स्कन्दपाणिपादा:, बहुत्वाद् बहुप्रलाप कण्डरासिराप्रताना:, शीघ्रत्वाच्छीघ्रसमारम्भ क्षोभविकारा: शीघ्रत्रास राग विराग: श्रुताग्रहिणोऽल्पस्मृतयश्च, शैत्याच्छीतासहिष्णव: प्रततशीतकोद्वेषकस्तम्भा:, पारूष्यात् परषकेशश्मश्रु रोम नखदशनवदन पाणिपादा:, वैशद्यात् स्फुटितांगावयवा: सततसन्धि शब्द गामिनश्च भवन्ति, त एवं गुणयोगाद्वातला: प्रायेणाल्पबलाश्चाल्पायुश्चाल्पापत्याश्चाल्प साधनाश्चाल्पधनाश्च भवन्ति।। (च0वि0 8/100)
वायु रूक्ष, लघु, चल, बहु, शीघ्र, शीत, परुष, विषद गुणयुक्त होता है। वायु के रूक्ष गुण के कारण वात प्रकृति वाले मनुष्य का शरीर रूखा, कृष और छोटा होता है। उनका स्वर अत्यंत रूक्ष, क्षाम, भिन्न, मंद, सक्त और जर्जर होता है। उन्हें निद्रा कम आती है। वायु के लघु होने से वात प्रकृति वाले मनुष्यों की गति चेष्टा एवं आहार लघु एवं चंचल होता है अर्थात् गति और चेष्टाएं थोड़ी और अनियमित होती है, भोजन थोड़ा और बार-बार होता है। वायु के चल गुण होने से वात प्रकृति वाले मनुष्य की संधि, हड्डी, भ्रु, हनु, ओठ, जीभ, शिर, कंधा, हाथ और पैर चंचल होते हैं। वायु में बहुगुण होने के कारण वात प्रकृति वाले अधिक बोलते हैं और उनके शरीर में कण्डरा तथा शिराओं का प्रसार अधिक दिखाई पड़ता है। वायु के शीघ्र गुण होने के कारण वात प्रकृति वाले मनुष्य सभी कार्यो को शीघ्र ही आरम्भ करते है और उनके मन में शीघ्र ही क्षोभ (दु:ख) उत्पन्न होता है। रोग भी शीघ्र ही उत्पन्न होते हैं। वे शीघ्र ही भय, प्रेम और वैराग्य से युक्त होते है और वात प्रकृति वाले किसी भी बात को सुनकर शीघ्र ही ग्रहण कर लेते हैं। पर उन्हें शीघ्र ही भूल भी जाते है। वायु के शीतगुण होने के कारण वातप्रकृति वाले मनुष्य शीतलता को नही सहने वाले होते हैं। उन्हें निरन्तर शीतजन्य विकार, कम्प तथा स्तम्भ (जकड़ाहट) होती रहती हैं। वायु के परुश होने के कारण वात प्रकृति वाले पुरुष के केष, दाढ़ी, रोम, नख, दॉंत, मुख, हाथ-पैर तथा शरीर के अन्य अंग परुश अर्थात खुरदरें होते है। वायु के विषद होने से वातप्रकृति वाले मनुष्य के अंग एवं प्रत्यंग फटे हुए होते हैं और उनकी संधियों से चलते समय निरन्तर शब्द निकलते रहते है। इस प्रकार इन उपर्युक्त गुणों के संयोग से वातप्रकृति वाला मनुष्य प्राय: अल्पबल वाला, कम आयु वाला, कम सन्तान वाला और कम साधन सामग्री वाला एवं दरिद्र होता है।
वातप्रकृति मनुष्य जागने वाला, शीत से द्वेष करने वाला, देखने में कुरुप, चोर, द्वेष बुद्धिवाला, अनार्य, गन्धर्व चित्त, हाथ-पैर फटे हुए, श्मश्रु, नख और केश छोटे एवं रुक्ष, हिंसाशील, सोते हुए दॉंतों को कट-कटाने वाला होता है।
वातप्रकृति मनुष्य धैर्यरहित, कच्ची मित्रता वाला, कृतघ्न, कृश, कठोर धमनियां दिखती है, बहुत बोलने वाला, जल्दी-जल्दी चलने वाला, इधन-उधर घूमने के स्वभाव का, अस्थिर चित्त वाला होता है। सोते हुए स्वप्न में आकाश में जाते हुए देखता है, अस्थिर बुद्धि, चंचल दृष्टि वाला होता है। इसके रत्न, धनसंचय और मित्र कम होते है। कुछ न कुछ बिना मतलब और बिना प्रसंग के बोलता रहता है।
सब दोषों में वायु के प्रबल होने से प्राय: करके वायु की अधिकता वाले मनुष्य वातदोष वाले, फटे हुए धूसर बाल एवं शरीर वाले, शीत से द्वेष रखने वाले, अस्थिर धृति, स्मृति, बुद्धि चेष्टा वाले, अस्थिर मित्रता, बहुत बोलने वाले, थोड़े धन, बलजीवन एवं निद्रा वाले, रूकी हुई अटकने वाली, चंचल तथा फटी हुई वाणी वाले, बहुत खाने वाले, विकासी गीत, हास्यमृगया और झगड़े में रूचि वाले, मधुर, अम्ल, लवण उष्ण के अभ्यास तथा चाह वाले लम्बे, पतले शरीर वाले, चलते हुए शब्द करने वाले, न तो दृढ़, न जितेन्द्रिय और न सन्त, न स्त्रियों के प्रिय और न बहुत सन्तति वाले होते हैं। इनके नैत्र कठोर धूल से भरे हुए के समान ओर गोल देखने में सुन्दर नही होते तथा मृत के समान सोते हुए खुले रहते है, स्वप्न में ये पहाड़, वृक्ष और आकाश में घूमते हैं । वातप्रकृति मनुष्य अभाग्शाली, द्वेष से भरे, चोर, अधिक उभड़ी हुई पिण्डलियों वाले, कुत्ता, गीदड़, चूहा, ऊँट और कौआ इनके स्वभाव के होते हैं।
जिस व्यक्ति के केश छोटे-छोटे, शरीर दुर्बल एवं रूक्ष हो, जिसकी मानसिक प्रवृत्तियां चंचल एवं वाचालता हो, जो व्यक्ति स्वप्न में वायुयानों में अथवा बिना किसी साधन के स्वयं उड़ता हो, ऐसे व्यक्ति वात प्रकृति के होते है।
जो कृष्णवर्ण, चंचल, अत्यंतकृष, अल्पकेश, रूक्ष शरीर, बलवान, सामर्थ्यवान, छोटे दॉंतों वाला, नखों की वृद्धि वाला, उच्च स्वर वाला, चक्रमण समर्थ, शीघ्रगामी, लोभी, सत्त्वहीन तथा खट्टारस खाने की इच्छा वाला, अच्छी प्रकार स्वेदन और मर्दन से सुखी हो, वह वात प्रकृति वाला होता है।
अल्प: केश: कृशो रूक्षो वा