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चरक संहिता - सूत्रस्थानम् (प्रथम अध्याय: दीर्घजीवितीयीय अध्याय)

Published on October 08, 2026 by Dr. Pankaj Jain

Published on October 08, 2026 by Dr. Pankaj Jain


तुलनात्मक अध्ययन


यही तुलनात्मक रूप से अन्य ग्रंथों के प्रथम अध्यायों को भी देख लेना उचित रहता है:



  1. सुश्रुत संहिता सूत्र स्थान: प्रथम अध्याय-वैदोत्पत्ति

  2. अष्टांग हृदय संहिता सूत्र स्थान: प्रथम अध्याय - आयुर्वेदावतरण

  3. अष्टांग संग्रह संहिता सूत्र स्थान: प्रथम अध्याय - आयुष्कामीय


यहा अन्य ग्रंथों के प्रथम अध्याय भी देख लेने चाहिए। साथ ही अध्याय संख्या एवं प्रत्येक स्थान मे अध्याय संख्या देख लेना चाहिए। जल्द ही ब्लॉग पर इसकी तुलनात्मक टेबल दे दी जाएगी।



1. सर्वप्रथम ग्रंथारंभ एवं मंगल आचरण


"अथ" शब्द के मंगलाचरण से होता है:



  • मंगल आचरण की परंपरा: मुनियों द्वारा निर्मित सभी ग्रंथों में ग्रंथ के आदि, मध्य और अंत में मंगल करने की परंपरा अत्यंत प्राचीन काल से चली आ रही है।

  • 'अथ' शब्द का महत्व: पौराणिक युग के पूर्व 'अथ' या 'ओम्' से ही मंगल किया जाता था क्योंकि दोनों को मांगलिक माना गया है। 'अथ' शब्द आनन्तर्यार्थे (निरंतरता या क्रम) का बोधक है।


चरक संहिता के उपदेश की पृष्ठभूमि: उत्तम कुल, शील, शौच, आचार और विनय से संपन्न शिष्यों (अग्निवेश आदि) द्वारा अपनी तथा प्राणिमात्र की दीर्घायु की इच्छा से प्रश्न किए जाने पर भगवान आत्रेय पुनर्वसु ने आयुर्वेद का उपदेश प्रारंभ किया।



2. मानव जीवन की तीन एषणाएँ (इच्छाएँ)


मनुष्य के जीवन-काल की तीन मुख्य एषणाएँ होती हैं:



  • प्राण-एषणा

  • धन-एषणा

  • परलोक-एषणा


मुख्य बिंदु: इनमें प्राण-एषणा का वर्णन सबसे पहले क्यों किया गया है? क्योंकि प्राण के अभाव में अन्य सभी इच्छाओं का कोई औचित्य नहीं रहता। इसी लिए दीर्घ जीवन की प्राप्ति के लिए ऋषियों ने आयुर्वेद का उपदेश सुनना चाहा था।



3. 'आयु' की परिभाषा एवं विभिन्न युगों में आयु-प्रमाण



  • आयु का स्वरूप: शरीर, इन्द्रियों, मन (सत्त्व) और आत्मा का संयोग ही 'आयु' कहलाता है।

  • युगानुसार मानव आयु: सूत्रस्थान के दूसरे अध्याय तथा महर्षि व्यास के वचनों के अनुसार विभिन्न युगों में मनुष्यों की पूर्ण आयु का प्रमाण इस प्रकार है:

    • कृतयुग: 400 वर्ष

    • त्रेतायुग: 300 वर्ष

    • द्वापरयुग: 200 वर्ष

    • कलियुग: 100 वर्ष





4. पुरुषार्थ-चतुष्टय और दीर्घ जीवन का संबंध



  • मानव जीवन का उद्देश्य पुरुषार्थ-चतुष्टय (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) की प्राप्ति करना है।

  • इन चारों पुरुषार्थों की सिद्धि निरोगी दीर्घ जीवन के बिना संभव नहीं है, इसीलिए प्रथम अध्याय में विशेष रूप से दीर्घ जीवन का उपदेश दिया गया है।



5. 'सूत्र' एवं 'सूत्रस्थान' की परिभाषा



  • सूत्र का लक्षण (सुश्रुत के अनुसार): “सूचनात् सूत्रणाच्चैव संधानादर्थसंततेः। अस्तोभमनवर्णं च सूत्रं सूत्रविदो विदुः॥” (अर्थात् जो कम शब्दों/अक्षरों में अधिक अर्थ को विस्तृत रूप से सूचित करे, वह सूत्र है)।

  • सूत्रस्थान का अर्थ: संपूर्ण आयुर्वेद तंत्र के विभिन्न विषयों रूपी पुष्पों को आपस में गूँथकर सुरक्षित रखने वाला स्थान सूत्रस्थान है। चरक संहिता के 8 स्थानों में सर्वप्रथम सूत्रस्थान का ही उपदेश दिया गया है।



6. अनुबंध-चतुष्टय (शास्त्र के चार मुख्य आधार)


किसी भी शास्त्र के प्रवर्तन के लिए निम्नलिखित चार का ज्ञान होना परम आवश्यक है:



  • अभिधेय (ज्ञान/विषय): हेतु, दोष, द्रव्य स्वरूप स्कंधत्रय तथा रोगों की उत्पत्ति को रोकना।

  • प्रयोजन (उद्देश्य): “धातसाम्यक्रिया चोक्ता तंत्रस्यास्य प्रयोजनम्” तथा “आतुरस्य विकारप्रशमनप्रसादः स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणम्”।

  • संबन्ध: वाच्य-वाचक लक्षण संबंध।

  • अधिकारी: “बोधोपयुक्तशब्द-तर्क-साहित्याध्यायितवैधः स चाध्येतव्यो” (उपयुक्त शब्द तर्क साहित्य आदि में रुचि रखने वाले ही इसके अधिकारी हैं)।



7. सूत्रस्थान में ४ प्रकार के सूत्र (वाक्य भेद)



  • गुरुसूत्र: गुरु अपने अभिमंत वाक्यों को जिस रूप में कहते हैं।

  • शिष्यसूत्र: गुरु के उपदेश के बाद शिष्य जिस सूत्र से अपनी शंकाओं को उपस्थित करता है।

  • प्रतिसंस्कर्ता सूत्र: प्रतिसंस्कर्ता द्वारा उपस्थित किये जाते हैं (जैसे — 'तमुवाच भगवानात्रेयः')।

  • एकीयसूत्र: प्रसंगवश जब कभी किसी स्थान पर अन्य आचार्य के सिद्धांत का उदाहरण दिया जाता है (जैसे — 'कुमारस्य शिरः पूर्वमभिनिवर्तते इति कुमारशिरा भरद्वाजः')।



8. आयुर्वेदवतरण (इतिहास एवं परंपरा)



  • भरद्वाज का इन्द्र के यहाँ गमन: दीर्घ जीवन की इच्छा रखने वाले भरद्वाज ऋषि इन्द्र के पास गए (वे इन्द्र को 'शरण्य' समझकर गए थे)।

  • भरद्वाज का नामकरण: इन्द्र के पास जाने वाले भरद्वाज को "उग्रतपा और अनंतपार" भी कहा गया है (जबकि इन्द्र को अमरेश्वर, सहस्त्र अक्षि, शक्र या अमरप्रभु भी कहा गया है)।

  • आयुर्वेद की पठन-पाठन परंपरा (अवतरण क्रम):

    1. ब्रह्मा ने स्मरण से प्राप्त आयुर्वेद का ज्ञान प्रजापति को दिया।

    2. प्रजापति ने अश्विनीकुमारों को दिया।

    3. अश्विनीकुमारों ने इन्द्र को दिया।

    4. इन्द्र से भरद्वाज ने आयुर्वेद का अध्ययन किया।





9. चरक सूत्रस्थान के ८ चतुष्क (विस्तृत विभाजन)


चरक सूत्रस्थान (कुल ३० अध्याय) को ८ चतुष्कों और अंत में २ संग्रह अध्यायों में बाँटा गया है:



  • भेषजतुष्क (अध्याय 1 से 4):

    • अध्याय 1: दीर्घजीवितीयीय

    • अध्याय 2 व 3: शरीरशुद्धिकर्ता (अपामार्गतण्डुलीय तथा आरग्वधितीय)

    • अध्याय 4: षड्विध विरेचनशतश्रितीय



  • स्वास्थ्यतुष्क (अध्याय 5 से 8):

    • अध्याय 5: तस्यशितीय (दिनचर्या)

    • अध्याय 6: तैःसांतितीय (ऋतुचर्या)

    • अध्याय 7: नवेगधारणीय

    • अध्याय 8: इन्द्रियोपक्रमणीय



  • निर्देशतुष्क (अध्याय 9 से 12):

    • अध्याय 9 & 10: क्षुद्रचतुष्पाद व महाचतुष्पाद

    • अध्याय 11: तिस्रेशीय (तीन एषणाएँ)



  • कल्पनातुष्क (अध्याय 13 से 16): स्नेहकल्पना, स्वेदनकल्पना, उपकल्पनीय, और चिकित्साप्राभृतीय।

  • रोगतुष्क (अध्याय 17 से 20): कियन्तःशिरसशिय, त्रिषोष्णीय, अष्टऔदरीय, और महारोगाध्याय।

  • योजनातुष्क (अध्याय 21 से 24): ८ प्रकार के निन्दित पुरुष, संतर्पणणीय योजना, और विधिशोणितीय।

  • अन्नपानतुष्क (अध्याय 25 से 28): रोग की उत्पत्ति, रसों पर वाद-विवाद, और अन्नपान-विधि।

  • संग्रहद्वय (अध्याय 29 और 30): 10 प्राणायतन, चिकित्सकों के लक्षण, हृदय-ओज और आयुर्वेदज्ञ के लक्षण।

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